पंचायतों का कार्यकाल

  • संविधान के अनुच्छेद 243 (E) में पंचायतों के कार्यकाल की अवधि निर्धारित की गई है प्रत्येक पंचायत अपनी प्रथम बैठक की तारीख से 5 वर्ष तक रहेगी तथा उसे समय से पहले भी भंग किया जा सकता है |ऐसी स्थिति में चुनाव छह माह के अंदर कराना अनिवार्य होंगे अगर ग्राम सभा निर्धारित समय से पूर्व भंग होती है किंतु कार्यकाल 6 माह से अधिक हो तो शेष बचे कार्यकाल के लिए चुनाव कराए जाएंगे और यदि कार्य का छह माह से कम बचा है तो चुनाव नहीं कराए जा सकते हैं |

सदस्यों के लिए योग्यताएं 

  • कोई भी व्यक्ति सदस्य के रूप में चुना जा सकता है यदि वह राज्य विधानमंडल के सदस्य के रूप में चुने जाने के लिए योग्य है परंतु आयु की अपेक्षा नहीं रखता हो क्योंकि नगरपालिका के लिए आयु 25 वर्ष है 21 वर्ष नहीं |

पंचायतों की शक्ति प्राधिकार, उत्तरदायित्व 

  • राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा पंचायतों को ऐसी शक्तियां प्रदान करेगा जो उन्हें स्वशासन के रूप में कार्य करने के लिए समक्ष बना सके|
  • जिससे वे आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं बना सके और उन्हें क्रियान्वित कर सकें और इसके अनुसार ग्यारहवीं अनुसूची में वर्णित सभी कार्यों को पंचायतों को क्रियांवित करना है |

कर लगाने की शक्ति 

  • राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा ऐसे कर जो शुल्क, पथकर, फ़ीसें, उदग्रहित, संग्रहित तथा विनियोजित करने का पंचायत को अधिकार दिया गया है तथा राज्यों के द्वारा अनुदान और केंद्र व राज्य सरकार द्वारा विकास कार्यों के लिए आवंटित की गई राशि और ऐसी निधियों को जमा करने के लिए पंचायत निधि कोष का गठन करना |

वित्त आयोग 

  • अनुच्छेद 243 (I) के तहत राज्य का राज्यपाल प्रत्येक 5 वर्ष की अवधि पर पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करने के लिए एक वित्त आयोग का गठन करेगा जो राज्यपाल को अपनी सिफारिश देगा जिसे राज्यपाल विधानमंडल में रखवाएगा | आयोग निम्न मामलों में अपनी सिफारिश देगा –
  1. राज्य द्वारा लगाए गए करो, पथकरो व शुल्कों का पंचायत और राज्यों के मध्य वितरण |
  2. पंचायत को सौपे जाने वाले कर के बारे में |
  3. वित्तीय स्थिति सुधारने के क्या आवश्यक उपाय हैं |
  4. अन्य ऐसे विषय जो राज्यपाल निर्धारित करें |
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