राज्यपाल निर्वाचित क्यों नहीं होता

भारतीय संविधान द्वारा राज्यपाल को नियुक्त किए जाने का प्रावधान किया गया है, संविधान द्वारा राज्यपाल को नियुक्त करने की पद्धति को अपनाने के लिए प्रमुख कारण थे –

  • राज्यपाल का प्रत्यक्ष निर्वाचन साधारण निर्वाचन के समक्ष नेतृत्व की कठिन समस्या उत्पन्न कर देगा |
  • राज्यों हेतु स्वीकृत संसदीय शासन व्यवस्था के अंतर्गत निर्वाचित राज्यपाल की व्यवस्था पूर्णत: असंगत सिद्ध होती क्योंकि निर्वाचित प्रधान होने पर राज्यपाल और मंत्रिमंडल में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी क्योंकि मंत्रिमंडल भी जनता द्वारा निर्वाचित और उसका प्रतिनिधि होता है |
  • देश के विभाजन और उसके कारण से उत्पन्न विभिन्न सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं को देखते हुए संविधान निर्माताओं ने देश की स्वतंत्रता और अखंडता की रक्षा हेतु राज्यों की अपेक्षा संघ को शक्तिशाली बनाने पर विचार किया |
  • प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से राज्य की जनता द्वारा निर्वाचित राज्यपाल राज्य के प्रधान के रूप में कार्यकर्ता संघीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, जबकि संविधान निर्माता यह चाहते थे कि कुछ परिस्थितियों में राज्यपाल संघ के प्रतिनिधि अथवा एजेंट के रूप में कार्य करें, अतः इन समस्त परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राज्यपाल की राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति की व्यवस्था की गई |
  • राज्यपाल की राज्य की राजनीतिक स्थिति में भूमिका एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष अध्यक्ष तथा निर्णायक की होती है यदि राज्यपाल को जनता अथवा विधान मंडल द्वारा निर्वाचित किए जाने की व्यवस्था की जाती है तो संभवत: राज्यपाल उसी राज्य का निवासी होता और इस बात की बहुत अधिक आशंका थी कि राज्यपाल स्वयं भी दलबंदी और गुटबंदी का शिकार हो जाता | अत: एक निर्वाचित प्रधान की अपेक्षा मनोनीत राज्यपाल की व्यवस्था का अंगीकरण संविधान निर्माताओं द्वारा उठाया गया यह एक सही और महत्वपूर्ण कदम था क्योंकि इससे राज्यपाल एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मध्यस्थ निर्णायक की भूमिका का निर्वहन अधिक कुशलतापूर्वक कर सकता है |
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