अलंकार की परिभाषा, प्रकार तथा उदाहरण

अलंकार (Alankaar) शब्दों में पाई जाने वाली अलंकार अनेक हैं उनमें से कुछ प्रमुख अलंकार इस प्रकार हैं अलंकार का अर्थ  अलंकार का अर्थ होता है – आभूषण या श्रंगार चांदी के आभूषण अर्थात सौंदर्यवर्धक गुण अलंकार कहलाते हैं | अलंकार स्वयं सौंदर्य नहीं होते, वे काव्य के सौंदर्य को बढ़ाने वाले सहायक तत्व होते […]

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संज्ञा की परिभाषा | भेद तथा उदाहरण

संज्ञा संज्ञा का शाब्दिक अर्थ है सम + ज्ञा अर्थात सम्यक ज्ञान कराने वाला | संज्ञा का दूसरा अर्थ है किसी भी व्यक्ति, वस्तु, स्थिति या गुण के नाम को संज्ञा कहते हैं | संज्ञा के भेद  संज्ञा के तीन भेद होते हैं | व्यक्तिवाचक संज्ञा – जो शब्द किसी विशेष व्यक्ति, विशेष वस्तु, विशेष […]

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अनेकार्थी शब्द

अनेकार्थी शब्द विभिन्न प्रसंगों से अनेक अर्थों में प्रयुक्त होने वाले शब्द ‘अनेकार्थी शब्द’ कहलाते हैं | ऐसे शब्दों को प्रसंग अथवा संदर्भ से ग्रहण किया जाता है | साहित्य में इनका प्रयोग होता है | अर्क – सूर्य, मदार का पौधा, इंद्र, स्फटिक, काढा  | पकड़ना – कड़ा होना, घमंड करना, दुराग्रह करना | […]

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सर्वनाम की परिभाषा | भेद एवं उदाहरण | Sarvnaam in Hindi

सर्वनाम (Sarvnaam in Hindi) सर्वनाम का अर्थ है – सबका नाम | अर्थात जो शब्द शब्द के नामों के स्थान पर प्रयुक्त होते हैं या हो सकते हैं, उन्हें सर्वनाम कहते हैं | दूसरे शब्दों में संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्द सर्वनाम कहलाते हैं | सर्वनाम के भेद -(Sarvnaam in Hindi) सर्वनाम […]

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समास की परिभाषा, भेद तथा उदाहरण | What is Samas in Hindi

समास (Samas in Hindi) समास का शाब्दिक अर्थ होता है – संक्षिप्त या दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने शब्द को समास कहते हैं | समास में दो शब्दों का योग होता है जबकि संधि में दो वर्णों का योग होता है समाज के कुल भेद इस प्रकार है | प्रमुख समास पद की […]

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रस के भेद एवं रस के भेद के उदाहरण | परिभाषा | प्रकार

रस के भेद रसों की संख्या 9 मानी जाती है श्रृंगार रस – इसका स्थाई भाव रति है नायक नायिका के सौंदर्य तथा प्रेम संबंधी वर्णन को श्रंगार रस कहते हैं श्रंगार के दो भेद होते हैं संयोग श्रृंगार जहां नायक-नायिका के मिलन का वर्णन होता है वहां सहयोग श्रंगार होता है | जैसे बतरस […]

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रस की परिभाषा, स्थायी भाव और रस के अंग

Ras Ke Prakar in Hindi | Hindi Grammar परिभाषा – काव्य को पढने से जिस आनंद की अनुभूति होती है अर्थात जिस अनिवर्चनीय भाव का संचार ह्रदय में होता है, उसी आनंद को रस कहा जाता है | रस का विवेचन सर्वप्रथम भरत मुनि ने अपने ग्रन्थ नाट्य शास्त्र में किया था | भरत मुनि […]

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