7 ऐसे युद्ध जिन्होंने भारत का इतिहास बदल दिया

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भारत में प्राचीन काल से आज तक अनेकों युद्ध लड़े गए लेकिन कुछ युद्ध ऐसे भी हुए जिन्होंने भारत के इतिहास को बदल कर रख दिया।  चलिये जानें ऐसे 7 युद्धों के बारे में जिन्होंने भारत का इतिहास बदल कर रख दिया

 

1. कलिंग का युद्ध (261 ईसा पूर्व)

  • कलिंग की और से 60000 सिपाही की सेना लड़ाई के मैदान में थी, तथा मौर्य सेना में 1 लाख से अधिक सिपाही थे।
  • इस युद्ध में महा-नरसंहार हुआ, लगभग समस्त कलिंग सेना मारी गयी और मौर्य सेना को भी विजय की भारी कीमत चुकानी पड़ी।
  • युद्ध की विभीषिका देख कर सम्राट अशोक के ह्रदय-परिवर्तन के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और भविष्य में युद्ध नहीं करने की प्रतिज्ञा भी की।

परिणाम  

  • भारत के सबसे शक्तिशाली सम्राट के बौद्ध धर्म ग्रहण कर अहिंसा के पथ पर चले जाने का प्रभाव भारत के इतिहास पर हमेशा के लिये रह गया।
  • बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ता गया और फिर एक समय संसार के सबसे आक्रामक साम्राज्य के अधिकाँश राजा अहिंसा पथ पर चल पड़े।
  • परिणामस्वरूप सैन्य बल में कम होते हुए भी विदेशी हमलावर अपनी आक्रमक रणनीति के बल पर यहां के राजाओं को परास्त करने में सफल रहे।

2. तराइन की दूसरी लड़ाई (1192)

  • सन 1191 तक भारत मुख्य रूप से हिन्दू राजपूत राजाओं के अनेक साम्राज्यों में बंटा हुआ था।
  • इससे पहले कुछ पश्चिमी हमलावर यहाँ आये जरूर लेकिन वो भारत के पश्चिमी भू-भाग तक लूट-पाट करने तक सीमित रहे और वापस लौट गए।
  • सन 1191 में पहली बार अफगानिस्तान के गौर प्रान्त के मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण किया। उसका मुकाबला दिल्ली के उत्तर-पश्चिम में स्थित तराइन के के मैदान में राजा पृथ्वीराज चौहान से हुआ। गौरी की हार हुई लेकिन अगले वर्ष वह फिर और अधिक तैयारी और सेना के साथ वापस लौटा।
  • सन 1192 के इस तराइन के युद्ध में अपनी आक्रामक घुड़सेना और रणनीति से उसने चौहान की भारी-भरकम सेना को हरा दिया।
  • पृथ्वीराज चौहान इस लड़ाई में मारा गया। इस युद्ध के बाद भारत में राजपूत राजाओं के राज का धीरे-धीरे अंत हो गया।
परिणाम 
  • भारत के इतिहास पर इस युद्ध से ज्यादा राजनीतिक-सामाजिक प्रभाव किसी और युद्ध का नहीं पड़ा। भारत में इस्लामिक शासन की शुरुआत इसी युद्ध से मानी जा सकती है।
3. पानीपत का युद्ध (1526)
  • उस समय दिल्ली पर लोदी सल्तनत के इब्राहिम लोदी का राज था।
  • दिल्ली के पास स्थित पानीपत में काबुल के शासक बाबर और इब्राहिम लोदी की सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
  • लोदी की सेना संख्या में अधिक और ज्यादा शक्तिशाली थी किन्तु उस समय के सामरिक हथियारों से कहीं उन्नत हथियार – अपनी 24 तोपों – के दम पर बाबर ने लोदी की सेना को हरा दिया और इस लड़ाई में इब्राहिम लोदी की मौत हुई।
  • इस प्रकार संसार के सबसे शक्तिशाली और लम्बे समय तक चलने वाले साम्राज्यों में से एक – मुग़ल शासन – की भारत में स्थापना हुई।
परिणाम
  • मुग़ल शासन ने भारत के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामजिक इतिहास को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।
  • आज जो भारत, विशेषकर उत्तर भारत, का ताना – बाना है, उसकी नींव मुग़ल शासन की स्थापना के साथ ही रख दी गई थी।

4. प्लासी का युद्ध (1757)

  • उस समय भारत में फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के बीच व्यापारिक और भविष्य के सामरिक आधिपत्य को लेकर संघर्ष चल रहा था।
  • सिराज-उद -दौला फ्रांसीसियों के समर्थन में था। सन 1756 में उसने अंग्रेजों के कलकत्ता स्थित व्यापार केंद्र पर हमला कर वहां मौजूद ब्रिटिश फ़ौज का नर-संहार कर दिया था।
  • प्लासी की लड़ाई में में मीर जाफर ने सिराजुद्दौला से गद्दारी कर ब्रिटिश फौजों का साथ दिया।
  • इस लड़ाई के बाद कुछ समय बंगाल की कमान मीरजाफ़र के हाथ रही किन्तु जल्दी ही उन्होंने वहां का शासन अपने हाथ में लेकर खुद ही बंगाल में राज करना आरम्भ कर दिया।

परिणाम 

  • प्लासी की लड़ाई ने भारत में अंग्रेजों के पांव मजबूती से जमा दिए। लार्ड क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने नवाब सिराजुद्दौला की सेना को प्लासी की लड़ाई में पूरी तरह से तहस-नहस कर के बंगाल में ब्रिटिश शासन स्थापित कर दिया।
  • यहाँ से कमाई हुई दौलत के बल उन्होंने अपनी सेना को और मजबूत किया और धीरे धीरे पूरे भारत में अपने साम्राज्य की स्थापना कर डाली।

 

5. कोहिमा का युद्ध (1944)  
  • कोहिमा भारत में बर्मा की सीमा के निकट नागालैंड में स्थित है। कोहिमा का यह युद्ध इतिहास में “पूरब के स्टालिनग्राद‘ के नाम से प्रसिद्ध है।
  • बर्मा पर जापानियों का आधिपत्य था जिन्होंने भारत में आधिपत्य की महत्वाकांक्षी योजना बनाई ताकि यहाँ सम्पदा का इस्तेमाल युद्ध में किया जा सके और अंग्रेजों की ताकत को कमजोर किया जा सके क्यूंकि अंग्रेज भी उस समय सेना और संसाधनों के लिए भारत पर ही निर्भर थे।
परिणाम
  • यहां पर मिली पराजय द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान जापानी फौजों को मिलने वाली सबसे महत्वपूर्ण शिकस्त थी जिसने भारतीय उपमहाद्वीप और संभवतया सारे संसार में जापानियों को बढ़ने से रोक दिया।
  • इस भयानक युद्ध में जापानियों की हार हुई और भारत का इतिहास नए सिरे से लिखते-लिखते रह गया।
  • यदि भारत या इसके बड़े भू-भाग पर जापानी अपना कब्ज़ा ज़माने में कामयाब हो जाते तो यह मित्र देशों के लिए बड़ा सामरिक नुक्सान होता।
  • साथ ही भारत का इतिहास भी हमेशा के लिए बदल जाता क्यूंकि संभव है कि मात्र तीन वर्ष बाद भारत को मिलने वाली स्वतंत्रता जापानी शासन के तले संभव न हो पाती।
6. तालीकोटा की लड़ाई
  • तालीकोटा की लड़ाई 26 जनवरी 1565 ईस्वी को दक्कन की सल्तनतों और विजयनगर साम्राज्य के बीच लड़ा गया था
  • विजयनगर साम्राज्य की यह लडाई राक्षस-टंगडी नामक गावं के नजदीक लड़ी गयी थी. इस युद्ध में विजय नगर साम्राज्य को हार का सामना करना पड़ा.
  • तालीकोटा की लड़ाई के समय, सदाशिव राय विजयनगर साम्राज्य का शासक था. लेकिन वह एक कठपुतली शासक था.
  • वास्तविक शक्ति उसके मंत्री राम राय द्वारा प्रयोग किया जाता था. सदाशिव राय नें दक्कन की इन सल्तनतों के बीच अंतर पैदा करके उन्हें पूरी तरह से कुचलने की कोशिश की थी.
  • हालाकि बाद में इन सल्तनतों को विजयनगर के इस मंसूबे के बारे में पता चल गया था और उन्होंने एकजुट होकर एक गठबंधन का निर्माण किया.
  • और विजयनगर साम्राज्य पर हमला बोल दिया था. दक्कन की सल्तनतों ने विजयनगर की राजधानी में प्रवेश करके उनको बुरी तरह से लूटा और सब कुछ नष्ट कर दिया.

परिणाम

  • तालीकोटा की लड़ाई के पश्चात् दक्षिण भारतीय राजनीति में विजयनगर राज्य की प्रमुखता समाप्त हो गयी.
  • मैसूर के राज्य, वेल्लोर के नायकों और शिमोगा में केलादी के नायकों नें विजयनगर से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की.
  • यद्यपि दक्कन की इन सल्तनतों नें विजयनगर की इस पराजय का लाभ नहीं उठाया और पुनः पहले की तरह एक दुसरे से लड़ने में व्यस्त हो गए और अंततः मुगलों के आक्रमण के शिकार हुए.
7. करनाल का युद्ध 
  • करनाल का युद्ध 24 फ़रवरी, 1739 ई. को नादिरशाह और मुहम्मदशाह के मध्य लड़ा गया
  • नादिरशाह के आक्रमण से भयभीत होकर मुहम्मदशाह 80 हज़ार सेना लेकर ‘निज़ामुलमुल्क’, ‘कमरुद्दीन’ तथा ‘ख़ान-ए-दौराँ’ के साथ आक्रमणकारी का मुकाबला करने के लिए चल पड़ा था।
  • शीघ्र ही अवध का नवाब सआदत ख़ाँ भी उससे आ मिला। करनाल युद्ध तीन घण्टे तक चला था।

परिणाम

  • इस युद्ध में ख़ान-ए-दौराँ युद्ध में लड़ते हुए मारा गया, जबकि सआदत ख़ाँ बन्दी बना लिया गया।
  • सम्राट मुहम्मदशाह, निज़ामुलमुल्क की इस सेवा से बहुत प्रसन्न हुआ और उसे ‘मीर बख़्शी’ के पद पर नियुक्त कर दिया
  • सआदत ख़ाँ ने मीर बख़्शी के इस पद से वंचित रहने के कारण नादिरशाह को धन का लालच देकर दिल्ली पर आक्रमण करने को कहा।
  • नादिरशाह ने दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दिया, तथा वह 20 मार्च, 1739 को दिल्ली पहुँचा। दिल्ली में नादिरशाह के नाम का ‘खुतबा’ पढ़ा गया तथा सिक्के जारी किए गए।
  • नादिरशाह दिल्ली में 57 दिन तक रहा और वापस जाते समय वह अपार धन के साथ ‘तख़्त-ए-ताऊस’ तथा कोहिनूर हीरा भी ले गया
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mahigopalMD ABBAS ALIRekhaAVDHESH KUMAR Recent comment authors
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poonam
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poonam

Hindi aubio

gagan giri goswami
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gagan giri goswami

Niceeeeee notesss thanku

AVDHESH KUMAR
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AVDHESH KUMAR

सर 101 दिसम्बर 2017 करेन्ट अफेयर्स का mp3 कब तक अपलोड होगा !!!

Rekha
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Rekha

Thanks sir

MD ABBAS ALI
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MD ABBAS ALI

thank you so much sir

gopal
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gopal

good work for all sir thanks

mahi
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mahi

thanks sir