दादा भाई नौरोजी का जीवन परिचय

दादा भाई नौरोजी

जन्म तथा प्राथमिक शिक्षा

  • दादाभाई का जन्म बम्बई में 8 सितम्बर, 1825 ई. को एक पारसी पुरोहित परिवार में हुआ था
  • चार वर्ष की अवस्था में उनके पिता का देहान्त हो गया. अतः दादाभाई का पालन-पोषण उनकी माता ने ही किया.
  • उनकी माता सम्पन्न घराने की नहीं थीं, अतएव बच्चे को ऊँची शिक्षा देने के लिए उन्हें बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा स्वयं अनपढ़ होते हुए भी वह शिक्षा के महत्व और उसकी उपयोगिता को खूब समझती थीं
  • उन्होंने दादाभाई को स्कूल की शिक्षा के अलावा घर पर भी नैतिक शिक्षा का बोध करवाया.
  • इसी ज्ञान का परिणाम था कि दादाभाई सदैव सच बोलते थे, कभी कोई अपशब्द मुँह से नहीं निकालते थे और अपना समय व्यर्थ नहीं गवॉते थे.
  • स्कूल की पुस्तकों के अतिरिक्त आपको बाहरी पुस्तकें पढ़ने का भी शौक था
  • फारसी काव्य ‘शाहनामा’ आपको बहुत प्रिय था, ‘ड्यूटिज ऑफ जोरोस्ट्रियेन्ज’ नाम की पारसी धर्म-पुस्तक से भी आपने बहुत कुछ ग्रहण किया. इस पुस्तक में पारसियों के कर्तव्यों का उल्लेख था

उच्च विचार

  • हावर्ड नाम के एक अंग्रेज की जीवनी ने भी दादाभाई के विचारों को प्रभावित किया
  • हावर्ड ने इंगलैण्ड के कैदियों की दशा सुधारने के लिए बहुत प्रयत्न किए थे
  • उनके जीवन में यह बात चरितार्थ थी कि मनुष्य दूसरों की सेवा करके ही अपना जीवन सार्थक बना सकता है
  • अपने प्रति उदार व्यक्तियों के ऋण चुकाने का भी यही उपाय है कि वह अपने से कम भाग्यशाली व्यक्तियों की सहायता करें.
  • दादाभाई की लगन व श्रेष्ठ स्वभाव से कॉलेज के सभी प्रोफेसर प्रसन्न थे, प्रिंसीपल महोदय ने उनके गुणों को देखकर यह भविष्यवाणी कर दी थी कि यह विद्यार्थी एक दिन महान पुरुष बनेगा.
  • उनकी इच्छा थी कि दादाभाई इंगलैण्ड जाकर आगे शिक्षा पूरी करें, इस हेतु वे आधा खर्च भी देने को तैयार थे, किन्तु बाकी आधे खर्च का इन्तजाम न हो पाने के कारण उन्हें विदेश यात्रा स्थगित कर एलफिस्टन कॉलेज में नौकरी करनी पड़ी.
  • वह पहले भारतीय शिक्षक थे, जिन्हें प्रोफेसर का सम्मान दिया गया था. इस पद पर आप छ: वर्ष तक रहे.
  • कॉलेज में पढ़ाने के अतिरिक्त आप समाज व देश की सेवा के कार्यों में तत्परता से लगे रहते थे.
  • अपने मित्रों की सहायता से आपने गरीब बच्चों के लिए ऐसे छोटे-छोटे स्कूल खुलवाए, जहाँ उन्हें निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी.
  • उस समय लड़कियों को शिक्षा देने की बात कोई सोचता भी न था. दादाभाई ने लड़कियों के लिए भी निःशुल्क शिक्षणालय खुलवाए. इस कार्य में उन्हें अपनी माता से बड़ी सहायता मिली.

बम्बई एसोसिएशन

  • 26 अगस्त, 1952 को आपने ‘बम्बई एसोसिएशन’ नाम से एक संस्था स्थापित की.
  • यह बम्बई में पहली राजनीतिक संस्था थी, जहाँ पढ़े-लिखे स्त्री-पुरुष अपने देश की उन्नति के लिए विचार-विनिमय करते थे.
  • एक और संस्था की भी आपने नींव रखी, जिसका कार्य अंग्रेजी की उत्कृष्ट पुस्तकों का देशी भाषाओं में अनुवाद करना था.
  • बाल-विवाह की प्रथा को नष्ट करने, विधवा-विवाह को उत्साहित करने व समाज की कुरीतियों व कुप्रथाओं को मिटाने के लिए आपने अनेक संस्थाओं को जन्म दिया.
  • उस समय के पारसी व अंग्रेज दादाभाई के इस कार्य से अति प्रसन्न थे और हमेशा उन्हें उत्साहित करते रहते थे,
  • दादाभाई ने ‘रास्तगुफ्तार’ नामक एक गुजराती साप्ताहिक पत्र भी प्रकाशित किया
  • रास्तगुफ्तार का अर्थ है सच कहने वाला इस पत्र का उद्देश्य भी समाज की कुरीतियों का विरोध करना व समाज सुधार का नया मार्ग जनता को दिखाना था.

इंगलैण्ड की यात्रा

  • शिक्षा-काल से ही आपकी इच्छा थी कि आप इंगलैण्ड में जाकर ऊँची शिक्षा प्राप्त करें. वह इच्छा धनाभाव के कारण पूरी नहीं हो पाई थी.
  • सन् 1856 में ‘कामा एण्ड कम्पनी’ नामक प्रसिद्ध व्यापारिक संस्था ने आपकी इच्छा पूरी कर दी.
  • संस्था के प्रमुख मिस्टर काभा दादाभाई के बाल सखा थे. उन्होंने दादाभाई को संस्था की ओर से धन देकर लन्दन जाने की उनकी इच्छा पूरी की.
  • इसके साथ ही दादाभाई प्रोफेसरी छोड़कर व्यापार की ओर अग्रसर हो गए, किन्तु जिस व्यापारिक कार्य से दादाभाई लन्दन गए थे, उसमें उन्हें सफलता नहीं मिली.
  • मूलतः आदर्शवादी व न्यायप्रिय होने के कारण वे अपने को व्यापार के छलपूर्ण वातावरण में समायोजित नहीं कर सके, अन्ततः इन्होंने उस फर्म को छोड़ दिया और 1859 में ‘दादाभाई नौरोजी एण्ड कम्पनी’ के नाम से इंगलैण्ड में अपनी फर्म कायम की और मुख्य रूप से कपास का व्यापार आरम्भ किया.
  • इसके बाद भी दादाभाई व्यापार में उन्नति नहीं कर पाए. उन्होंने इंगलैण्ड में रहकर भी सार्वजनिक कार्यों में अधिक रूचि ली.
  • इंगलैण्ड में रहने वाले भारतीयों की सहायता करने एवं उनकी स्थिति सुधारने के लिए आपने ‘ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन’ नामक संस्था की स्थापना की.
  • इस कार्य में आपको कई भारतीय नरेशों व प्रमुख नागरिकों का सहयोग मिला, बहुत से अंग्रेज भी इस संस्था के सदस्य बने. इसका उद्देश्य यही था कि इंगलैण्ड के नागरिकों के सम्मुख भारत के निवासियों की वास्तविक दशा उपस्थित की जाए और उन्हें इस दशा में सुधार के लिए भारत के राज्याधिकारियों को प्रेरित करने की प्रेरणा दी जाए.
  • इस संस्था ने इंगलैण्डवासियों को यह बता दिया कि भारत की निर्धनता, अशिक्षा व अपमानजनक बातों के लिए ब्रिटिश राज्य ही जिम्मेदार है।
  • इंगलैण्ड में भारतीयों के लिए किए गए कार्यों के समाचार हमारे देशवासियों को भी मिलते रहते थे, इसलिए सन् 1869 में दादाभाई के बम्बई आने पर, बम्बई के नागरिकों ने एक सभा आयोजित कर सम्मानस्वरूप इन्हें रुपयों की थैली भेंट की. उन्होंने प्राप्त धन को गरीबों में बँटवा दया.
  • कुछ दिनों बाद दादाभाई ने फिर इंगलैण्ड की यात्रा की. इस बार आपने वहाँ जाकर भारतवासियों के लिए कम तैयार कर सहानुभूतिपू रवैया अपनाने को तैयार किया. ब्रिटिश नागरिकों को आपने बताया कि ब्रिटिश राज्य की छत्रछाया में रहने वाले भारतीयों की औसत आमदनी बीस रुपए प्रति वर्ष से अधिक नहीं है, इंग्लैण्डवासियों को इस वक्तव्य पर विश्वास नहीं होता था. तब दादाभाई ने इसकी पुष्टि में प्रमाण एकत्रित करके ‘पावर्टी एण्ड अन ब्रिटिश रूल इन इण्डिया’ नाम से एक पुस्तक लिखी. इस पुस्तक ने ब्रिटिश लोगों की आँखें खोल दीं. |

भारत आगमन

  • जब दादाभाई भारत आए तो बड़ौदा के महाराज ने आपको रियासत का दीवान बनाकर सम्मानित किया.
  • इस पद पर आप दो वर्ष तक रहे. इन दो वर्षों में आपने बड़ौदा में इतने महत्वपूर्ण सुधार किए कि बड़ौदा देश की सर्वोत्तम रियासत मानी जाने लगी. बाद में कुछ लोगों के विरोध के कारण वे त्यागपत्र देकर बम्बई चले आए.
  • बम्बई में दादाभाई ने लोकसेवा के कार्यों में बड़ी तत्परता से भाग लेना शुरू कर दिया. इन सेवाओं के पुरस्कार में आपको कार्पोरेशन और बम्बई विधान परिषद् का सदस्य बनाकर सम्मानित किया गया. दोनों सभाओं के सदस्य रहकर आप बम्बई की समस्त सार्वजनिक गतिविधियों के केन्द्र बन गए थे.
  • आज बम्बई शहर जिन राष्ट्रीय संस्थाओं के कारण देश का अग्रणी माना जाता है, उनकी नींव में दादाभाई का ही हाथ था.

कांग्रेस पार्टी गठन

  • सन् 1885 में दादाभाई के सार्वजनिक कार्यों का श्रेष्ठतम परिणाम कांग्रेस पार्टी के गठन के रूप में सामने आया.
  • मिस्टर ए.ओ. ह्यूम के साथ मिलकर राष्ट्र की सर्वोच्च संस्था बनाई गई अंग्रेज होते हुए भी ह्यूम भारतीयों के कष्ट को समझते थे और भारत के प्रति सहानुभूति रखते थे.
  • उनका उद्देश्य यही था कि इस संस्था में सम्मिलित होकर भारतीय अपने दुःख दर्द सरकार तक पहुँचा सके और समस्याओं का हल निकालने का यत्न कर सकें. दादाभाई इस विचार से सहमत थे, सन् 1886 में दादाभाई को कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया.

 ब्रिटिश पार्लियामेंट सदस्यता

  • सन् 1886 में दादाभाई ने तीसरी बार इंगलैण्ड का प्रवास किया. इस बार वहाँ जाकर उन्हें अनुभव हुआ कि उन्हें ब्रिटिश पार्लियामेंट का सदस्य बनना चाहिए, क्योंकि इससे ब्रिटिश लोकमत को भारत के अनुकूल बनाने में मदद मिलेगी.
  • लम्बे समय तक संघर्ष के उपरान्त 1892 में वे ब्रिटिश पार्लियामेंट के सदस्य चुन लिए गए.
  • सदस्य बनने के बाद ‘हाऊस ऑफ कॉमन्स’ में उन्होंने जो प्रथम भाषण दिया वह उनकी देशभक्ति का परिचायक था.
  • इस सम्बोधन में उन्होंने कई महत्वपूर्ण सुझाव रखे, जिनमें एक यह भी था कि आई.सी.एस. (इण्डियन सिविल सर्विस) की परीक्षा इंगलैण्ड और भारत में एक साथ हो. इससे अधिक भारतीयों को आगे बढ़ने का सुअवसर प्रदान करना ही उनका उद्देश्य था.

कांग्रेस का अधिवेशन

  • 1893 में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ
  • दादाभाई को इस अधिवेशन का सभापति चुनकर देशवासियों ने उनके प्रति अगाध सम्मान प्रकट किया.
  • जब आप बम्बई से लाहौर जा रहे थे, तो जगह-जगह पर, रेलवे स्टेशनों पर जनता ने स्वागत किया. लाहौर के युवकों में इतना जोश था कि उन्होंने दादाभाई के लिए रथ सजाकर तैयार किया और जुलूस में उसे अपने हाथों से खींचा.
  • 1906 में दादाभाई नौरोजी को तीसरी बार कांग्रेस अध्यक्ष बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.
  • उस समय कांग्रेस के नरम दल व गरम दल के मध्य मतभेद चरमावस्था में था.
  • दादाभाई के अथक प्रयासों के बावजूद भी कांग्रेस का विभाजन टल न सका. 1907 में सूरत अधिवेशन में नरम-गरम दल के रूप में कांग्रेस का विभाजन हो गया.

 अन्तिम दिवस

  • जीवन के अन्तिम काल में दादाभाई नौरोजी बम्बई से बीस मील दूर समुद्र तट के गाँव ‘वरसोवा’ में विश्राम के लिए चले गए.
  • विश्राम-काल में भी आपने अपने परामर्श से राष्ट्रीय कार्यों का पथ-प्रदर्शन किया.
  • अन्त में एक महीने की बीमारी के बाद 30 जून, 1917 को आप स्वर्गवासी हो गए.
  • अपने अन्तिम समय तक वे राजनीतिक दलबन्दियों के प्रभाव से अछूते रहे. समस्त देशवासी दादाभाई को राष्ट्र-पितामह’ के रूप में मानता था और अब भी उसी रूप में याद करता है.

उपसंहार

  • भारत के स्वतंत्रता संग्राम को सही दिशा देने वाले अग्रिम पंक्ति के नेताओं में दादाभाई नौरोजी का सबसे प्रमुख स्थान है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी.
  • वे भारत की राष्ट्रीय विचारधारा के प्रणेता थे.
  • स्वराज्य’ शब्द का पहला प्रयोग भी दादाभाई ने ही किया था, जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने जन्मसिद्ध अधिकार बनाकर इस मंत्र की सिद्धि की थी.
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