ख़ान अब्दुल गफ्फार खान का जीवन परिचय

अब्दुल गफ्फार खान

  • ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का जन्म 6 फरवरी 1890 को पेशावर (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था।
  • उनके पिता ‘बैरम ख़ान‘ शांत स्वभाव के थे और ईश्वरभक्ति में लीन रहा करते थे।
  • उनके परदादा ‘अब्दुल्ला ख़ान’ बहुत ही सत्यवादी और जुझारू स्वभाव के थे। 
  • उनके पिता ने अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को शिक्षित बनाने के लिए ‘मिशनरी स्कूल’ में भेजा, पठानों ने उनका बड़ा विरोध किया।
  • मिशनरी स्कूल की पढ़ाई समाप्त करने के बाद वे अलीगढ़ आ गए। 
  • समाजसेवा करना उनका मुख्य काम था। शिक्षा समाप्त कर वह देशसेवा में लग गए।
  • रॉलेट एक्ट के ख़िलाफ़ 1919 में हुए आंदोलन के दौरान ग़फ़्फ़ार ख़ां की गांधी जी से मुलाक़ात हुई और उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। 
  • महात्मा गांधी की तरह अहिंसा के रास्ते पर चलने के कारण खान अब्दुल गफ्फार खान को फ्रंटियर गांधी(सीमान्त गांधी) के उपनाम से पुकारा जाता था।
  • महान स्वतंत्रता सेनानी और भारत रत्न से सम्मानित खान अब्दुल गफ्फार खान को “सीमान्त गांधी”, “फ्रंटियर गांधी”, “बच्चा खाँ” तथा “बादशाह खान” के नाम से भी पुकारा जाता है।
  • अंग्रेजों से आजादी के साथ-साथ एक संयुक्त, स्वतन्त्र और धर्मनिरपेक्ष भारत बनाने के लिए उन्होंने ‘खुदाई खिदमतगार’ नामक सामाजिक संगठन प्रारंभ किया जिसे ‘सुर्ख पोश’ भी कहा गया।
  • खुदाई खिदमतागर, गांधी जी के अहिंसात्मक आंदोलन से प्रेरित था।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान ने कांग्रेस के समर्थन से भारत के पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रान्त में ऐतिहासिक ‘लाल कुर्ती’ आन्दोलन चलाया।
  • नमक सत्याग्रह में खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में खुदाई खिदमतगार के समर्थन में बड़ी संख्या में लोग पेशावर में प्रदर्शन में शामिल हुए।
  • अंग्रेजों ने इन निहत्थे लोगों पर मशीन गन से गोली चलाने का आदेश दे दिया लेकिन चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट की पल्टून ने अहिंसक प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया।
  • बाद में चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके सैनिकों को कोर्ट मार्शल की कार्रवाई झेलनी पड़ी।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान ने अपनी 98 वर्ष की जिंदगी में कुल 35 साल जेल में गुजार दी।
  • उन्होंने ना केवल ब्रिटिश सरकार से भारत की आजादी के लिए संघर्ष किया बल्कि वे ‘स्वतंत्र पख्तूनिस्तान’ आंदोलन के प्रणेता भी थे।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान ने सदैव ‘मुस्लिम लीग’ के दो राष्ट्रों के सिद्धांत को नकारते हुए देश के विभाजन के मांग का विरोध किया।
  • कांग्रेस द्वारा विभाजन को स्वीकार कर लिया गया तब वो बहुत निराश हुए और कहा कि, ‘आप लोगों ने हमें भेड़ियों के सामने फ़ेंक दिया।”
  • जून 1947 में खान साहब और खुदाई खिदमतगार ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें मांग की गई कि पाकिस्तान के साथ मिलाए जाने की बजाय पश्तूनों के लिए अलग देश पश्तूनिस्तान बनाया जाए। लेकिन अंग्रेजों ने उनकी इस मांग को खारिज कर दिया।
  • आजादी के बाद जब भारत और पाकिस्तान अलग-अलग हुए तो खान अब्दुल गफ्फार खान पाकिस्तान चले गए। लेकिन पाकिस्तान सरकार के विरोध के कारण उनका ज्यादातर वक्त जेल या फिर निर्वासन में गुजारा।
  • खान अब्दुल गफ्फार खान को सन 1987 में भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।
  • सन 1988 में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें पेशावर में उनके घर में नज़रबंद कर दिया गया। 20 जनवरी, 1988 को उनकी मृत्यु हो गयी और उनकी अंतिम इच्छानुसार उन्हें जलालाबाद अफ़ग़ानिस्तान में दफ़नाया गया।