18वीं शताब्दी में भारत की राजनीतिक स्थिति

18वीं शताब्दी में भारत की राजनीतिक स्थिति

  • 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगल साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया।
  • 1739 ई० एवं 1747 ई० में क्रमश: नादिरशाह 811 18वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के एवं अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों ने पतन के बाद स्वतंत्र हुए राज्य मुगलों की केंद्रीय सत्ता को कमजोर कर दिया।
  • दुर्बल केंद्रीय सत्ता का लाभ उठाकर कई अधीन एवं अर्द्धस्वतंत्र राज्यों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। 
  • इन राज्यों में हैदराबाद, अवध एवं बंगाल ही मुगल साम्राज्य से अलग हुए, शेष सभी अर्द्धस्वतंत्र राज्य थे !
  • हैदराबाद के आसफजाही वंश का प्रवर्तक चिनकिलिच खाँ था, जिसे निजाम-उल-मुल्क भी कहा जाता था। 
  • निजाम-उल-मुल्क के निधन के पश्चात हैदराबाद पर शासन करने वालों में नासिर जंग,मुजफ्फर जंग एवं सालारजंग थे। 
  • अवध के संस्थापक सआदत खाँ को मुगल सम्राट मुहम्मद शाह ने बुरहान-उल-मुल्क की उपाधि से सम्मानित किया। 
  • सआदत खाँ के बाद अवध पर सफदर जंग एवं शुजाउद्दौला ने शासन किये। 
  • 1701 ई० में मूर्शिद कुली खाँ को बंगाल की दीवानी प्राप्त हुई तथा उसने 1717 ई० में बंगाल के स्वतंत्र होने की घोषणा कर दी। 
  • 1740 ई० से 1756 ई० तक बंगाल पर अलीवर्दी खाँ का शासन रहा। 
  • बंगाल का अंतिम नवाब 1756 ई० में सिराजुद्दौला बना। वह 1757 ई० तक गद्दी पर रहा।

पेशवाओं के अधीन मराठों का विस्तार

  • 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात शिवाजी के प्रपौत्र साहू को मुगल बादशाह बहादुर शाह प्रथम ने मुगल कैद से आजाद कर दिया।
  • साहू ने 1708 ई० में सतारा को अपने राज्य का केंद्र-बिंदु बनाया।
  • 18 वर्षों तक मुगल कैद में रहने के कारण साहू को प्रशासन का ज्ञान नहीं था, अतः शासन की देख-रेख उसने पेशवा को सौंप दी।
  • मराठों के पेशवा इस प्रकार थे-बालाजी विश्वनाथ (1713-20 ई०), बाजी राव-1 (1720-40 ई०), बालाजी बाजी राव (1740-61 ई०), माधव राव-1 (1761-72 ई०), नारायण राव (1772-73 ई०), माधव राव-II (1773-96 ई०), बाजी राव-II (1796-1818 ई०)। 
  • पेशवाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ था।
  • बालाजी विश्वनाथ ने खानदेश, बरार, बीदर, बीजापुर, गोलकुंडा तथा औरंगाबाद से चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार प्राप्त किया। 
  • बालाजी विश्वनाथ ने सैय्यद बंधुओं का दमन करने में योगदान दिया। 
  • मराठों के पेशवा बाजी राव-1 ने मराठा संघ की स्थापना कर मराठा शक्ति का विस्तार किया, इस संघ के सदस्य थे-पेशवा (पूना), सिंधिया (ग्वालियर), गायकवाड़ (बड़ौदा), होल्कर (इंदौर) तथा भोंसले (नागपुर)।
  • द्वितीय पेशवा बाजीराव-1 ने 1733 ई० में पुर्तगालियों को हराकर उनसे सालसेट एवं बसीन के प्रदेश प्राप्त किये।
  • बाजीराव-I ने 1737 ई० में दिल्ली के आस-पास घेराबंदी कर लूट-पाट की। उसने मराठा शक्ति को अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। 
  • मस्तानी नामक महिला के साथ बाजीराव-I के प्रेम-संबंद्ध थे। 
  • बाजीराव-Iने पालखेड़ा के युद्ध में हैदराबाद के निजाम-उल मुल्क को हराया तथा दोनों के बीच मुंशी शिवगांव की संधि हुई।
  • तीसरा पेशवा बालाजी बाजीराव भी एक महान विजेता था, उसने 1757 ई० को मुगलों की तत्कालीन राजधानी दिल्ली पर अधिकार कर लिया।
  • बालाजी बाजीराव के कार्यकाल में मराठों ने पंजाब एवं अटक को जीत लिया।
  • 1761 ई० में बालाजी बाजीराव को पानीपत के तीसरे युद्ध में अहमद शाह अब्दाली से हारना पड़ा तथा यहीं से मराठों का पतन आरंभ हो गया। 

मैसूर

  • मैसूर राज्य की स्थापना हैदर अली ने 1766 ई० में की। उसका जन्म मैसूर में 1721 ई० में हुआ। 
  • 1766 ई० में मैसूर का शासक बनने के बाद हैदर ने अपने राज्य की सीमाएँ पूरब में पूर्वी घाट, पश्चिम में पश्चिमी घाट एवं दक्षिण में कावेरी नदी तक बढ़ाई। 
  • हैदर अली को मराठों के पेशवा माधव राव ने 1764 ई० में युद्ध में परास्त कर दिया।
  • हैदर अली ने 1782 ई० तक, तथा उसके बाद उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने 1799 ई० तक मैसूर पर शासन किया। 

केरल 

  • 18वीं शताब्दी के आरंभ में केरल अनेक छोटे-छोटे क्षेत्रों में विभाजित था।
  • इस काल में कालीकट, कोचीन, चिरक्कल एवं ट्रावणकोर आदि महत्वपूर्ण थे।
  • ट्रावणकोर के राजा मर्तंड वर्मा ने अपने राज्य का विस्तार किया तथा डचों को पूर्णरूपेण केरल से बाहर निकाल दिया।
  • 1800 ई० में ट्रावणकोर में एक ब्रिटिश रेजीडेंट कर्नल कोलिन मैकॉले की नियुक्ति हुई।
  • 1805 ई० में ट्रावणकोर सहायक संधि के तहत ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभुत्व में आ गया।

राजपूताना 

  • 18वीं शताब्दी के आरंभ में राजपूताने में जोधपुर एवं आमेर (जयपुर) दो प्रमुख राज्य थे। उपरोक्त के अलावा दिल्ली से सटा समस्त क्षेत्र राजपूतों के अधीन था।
  • जोधपुर (मारवाड़) का प्रमुख शासक अजीत सिंह था जबकि आमेर का शासक जय सिंह था। जयपुर के शासक सवाई जय सिंह एक उच्चस्तरीय विद्वान एवं विज्ञान की समझ रखने वाला शासक था
  • जय सिंह ने खगोल विद्या के अध्ययन के लिए 5 वेधशालाओं का निर्माण कराया।
  • जय सिंह ने सारणियों के सेट तैयार कराये तथा त्रिकोणमिति की कई प्रसिद्ध पुस्तकों का अनुवाद कराया।
  • सवाई जय सिंह द्वारा वैज्ञानिक पद्धति से जयपुर शहर का निर्माण कराया गया। 
  • जय सिंह ने रेखा गणित के तत्व नामक यूक्लिड रचित ग्रंथ का संस्कृत भाषा में अनुवाद कराया।

दिल्ली एवं आस-पास के क्षेत्र 

  • दिल्ली के पास आगरा एवं मथुरा जाटों के प्रभुत्व में थे। 
  • भरतपुर में बदन सिंह के दत्तक पुत्र सूरजमल (1756-63 ई०) का शासन था, वह एक योग्य एवं 
  • शक्तिशाली शासक था। सूरजमल द्वारा अपने राज्य का विस्तार पूर्व में गंगा, दक्षिण में चंबल, पश्चिम में आगरा एवं उत्तर में दिल्ली तक किया गया। 
  • 1763 ई० में सूरजमल की मृत्यु के पश्चात इस राज्य का पतन हो गया। 
  • दिल्ली में 1707 ई० से 1748 ई० तक बहादुर शाह (1707-12 ई०),जहाँदार शाह (1712-13 ई०), फरुर्खशियर (1713-19 ई०), मुहम्मद शाह रंगीला (1719-48 ई०) आदि मुगल शासकों ने शासन किया।

सिख 

  • गुरु गोविंद सिंह की मृत्यु के पश्चात सिखों को बंदा सिंह ने नेतृत्व प्रदान किया। 
  • 1748 ई० में खालसा दल का निर्माण तथा पंजाब में सिखों के 12 मिसलों का गठन हुआ। 
  • प्रत्येक मिसलदार को एक निश्चित भू-क्षेत्र प्रदान किया जाता था। इन्हीं मिस्लों में राजा रणजीत सिंह एक मिस्ल शुक्रचकिया का प्रतिनिधित्व करता था।
  • रणजीत सिंह ने 1799 ई० में लाहौर एवं 1805 ई० में अमृतसर पर अधिकार कर लिया। रणजीत सिंह ने 1809 ई० में अमृतसर की संधि द्वारा अंग्रेजों के सतलज के आस-पास के क्षेत्रों पर प्रभुत्व को मान्यता दे दी।
  • कुछ समय पश्चात रणजीत सिंह ने मुल्तान, कश्मीर तथा पेशावर पर भी अधिकार कर लिया। इस कार्य में हरि सिंह नलवा ने उसकी मदद की।
  • 1839 ई० में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के 10 वर्षों के बाद उनका राज्य विलुप्त हो गया। 

असम एवं पूर्वोत्तर

  • 18वीं शताब्दी के आरंभ में अहोम, कछार, जयंतिया तथा मणिपुर पूर्वोत्तर के प्रमुख राज्य थे। 
  • ब्रिटिश काल में असम समेत पूर्वोत्तर का तमाम क्षेत्र असम प्रांत के नाम से जाना जाता था। 
  • इस प्रदेश का प्राचीन नाम प्रागज्योतिषपुर एवं कामरूप था। 
  • सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से यह क्षेत्र वैष्णव एवं शैव संप्रदायों का गढ़ है। ब्रह्मसमाज ने भी इस क्षेत्र को प्रभावित किया। 
  • इस क्षेत्र में रुद्रसिम्हा (1694-1714 ई०) एवं शिव सिंह (1714-44 ई०) प्रमुख शासक हुए। 
  • रुद्रसिम्हा को पूर्वी भारत का शिवाजी कहा जाता है।

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