जापान में किस प्रकार की कृषि की जाती है ?

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जापान की कृषि की प्रमुख विशेषताएं एवं जापान की प्रमुख कृषि फसलों का वर्णन:-

जापान की कृषि की प्रमुख विशेषताएं:- 

धरातलीय विषमता के कारण जापान की करीब 15% भूमि कृषि योग्य है। इसकी दो-तिहाई भूमि पर्वतों एवं जंगलों के अंतर्गत हैं। यहां सीढ़ीदार खेतों को मिलाकर लगभग 28% भाग पर कृषि की जाती है। 
जापान की कृषि की विशेषताएं निम्न प्रकार हैं- 

1. सघनतम भूमि उपजाऊ
2. प्रचुर उत्पादन युक्त कृषी
3. वैज्ञानिक एवं मशीनीकृत कृषि
4. अकृष्य भूमि पर कृषि विस्तार
5. सीढ़ीदार कृषि
6. बहुफसली कृषि

1. सघनतम भूमि उपजाऊ:-  कृषि क्षेत्र की कमी के कारण जापान में सघन कृषि की जाती है। एक ही कृषि फार्म से वर्ष में अनेक फसलों का उत्पादन होता है। उत्पादनों में धान, गेहूं, सब्जियां, फल इत्यादि प्रमुख हैं। इस प्रकार की कृषि मुख्य रूप से दक्षिणी पश्चिमी जापान में की जाती है। 

2. प्रचुर उत्पादन युक्त कृषी:-  सघन कृषि के कारण कृषि क्षेत्रों की मिट्टी में उपजाऊ तत्वों का ह्वास हो जाता है। जापानी हरी खाद, कंपोस्ट खाद, मछली की खाद, फसलों के अवशेष आदि को मिट्टी को अधिक उत्पादन युक्त बनाने के लिए प्रयोग करते हैं। साथ ही रसायनिक खादों का भी प्रयोग किया जाता है।

3. वैज्ञानिक एवं मशीनीकृत कृषि:-  जापान एशिया का अकेला देश हैं। जिसने कृषि कार्यों में आधुनिक मशीनों का सफल प्रयोग किया है। यहां कृषि करने की नई नई विधियों का आविष्कार किया जाता है। जुताई से लेकर फसल कटाई तक सभी कार्य मशीनों द्वारा संपादित होते हैं। छोटे-छोटे खेतों में खेतों में उपयोग में आने वाली मशीनों का यहां आविष्कार किया गया है। फसलों पर कीटनाशक दवाओं का प्रयोग उन्नतिशील मशीनोंं द्वारा होता है। जापान कृषि यंत्रों का और कीटनाशक दवाओं का विश्वव में बहुत बड़ा निर्यातक देश है।

4. अकृष्य भूमि पर कृषि विस्तार:-  जापान में तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या का भार दिनोंदिन कृषि भूमि पर बढ़ता गया जिसके परिणाम स्वरुप खाद्यान्न की कमी होने लगी इसके कारण उबड़ खाबड़ खेतों को भी समतल करके फसल उत्पादन हेतु कृषि योग्य बनाया गया। यही कारण है कि जापान में चारागाह का क्षेत्रफल बहुत कम है जिसके कारण जापान मे दुग्ध उद्योग कम महत्वपूर्ण है। इस देश में मांस की अपेक्षा मछली का महत्व अधिक है।

5. सीढ़ीदार कृषि:-  सीढ़ीदार कृषि जापानी कृषि की एक प्रमुख विशेषता है। इस प्रकार की कृषि को दो भागोंं में विभाजित किया जा सकता है।
प्रथम- निचले भागों की सिंचित कृषि जिसमें में धान का उत्पादन अधिक होता है।

द्वितीय असिंचित ऊपरी भागों की कृषि जिसमें फसलों के साथ-साथ फलों एवं सब्जियों की कृषि होती हैं। इस प्रकार की कृषि को श्रम साध्य कहते हैं।

6. बहुफसली कृषि:-  जापान में खेतों का आकार छोटा होने के साथ-साथ कृषकों के पास कृषि योग्य भूमि की कमी है। यहां 2.5 एकड़ से भी कम क्षेत्र वाले खेत पाए जाते हैं। अन्य देशों की भांति वर्ष में केवल एक ही फसल नहीं उगाई जाती बल्कि अधिक उत्पादन के लिए एक फसल के साथ साथ कई अन्य फसलें उगाई जाती है। खेतों में ऐसी फसलें बोई जाती है जिन को तैयार होने का समय कम हो ताकि वहां साथ में बोई गई दूसरी फसलों की कृषि को सुगमता पूर्वक की जा सके।

जापान की प्रमुख कृषि फसलों का वर्णन:- 

जापान में कुल 60 से 65 लाख हेक्टेयर भूमि पर ही कृषि की जाती है। जो इस देश की कुल भूमि का लगभग 16% भाग है। यह जापान की 12.75 करोड़ जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। जापान की गहन कृषि के अंतर्गत अनेक फसलें बोई जाती है। 

जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण फसलों का वर्णन निम्न है। 
1.चावल
2. गेहूं
3. जौ
4. चाय
5. अन्य फसलें

1. चावल:-  जबकि जापान विश्व का केवल 2% चावल ही पैदा करता है। फिर भी यह एक महत्वपूर्ण देश है। क्योंकि यहां चावल को उगाने की उत्तम विधि अपनाई जाती है। जिसे जापानी विधि कहते हैं। इस कारण यहां पर प्रति हेक्टेयर उत्पादन 6706 किलोग्राम है जबकि भारत में केवल 2127 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर चावल उत्पन्न किया जाता है। यहां जल्दी तैयार होने वाली फसलें बोई जाती है। जो 60 से 90 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं। जापान के लगभग 50% कृषि भूमि पर चावल की कृषि की जाती है जनसंख्या अधिक होने के कारण चावल की मांग अधिक है। और मैदानी भाग कम है। इसलिए पर्वती ढलान पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर चावल की कृषि की जाती है। यहां पर चावल की कृषि का बहुत महत्व है। क्योंकि जापानियों का प्रिय भोजन चावल मछली है। 

2. गेहूं:-  चावल के बाद गेहूं जापान की दूसरी मुख्य फसल है। इस देश की कुल भूमि पर लगभग 10% भाग पर गेहूं की कृषि की जाती हैं। यह मुख्य रूप से होन्शु, शिकोकूू के तटीय भागों में बोई जाती है। जापान का पश्चिमी तटीय मैदान अधिक आर्द्र है। और गेहूं की कृषि के लिए अनुकूल नहीं है। 

3. जौ:-  लगभग 8 लाख हेक्टेयर या कुल कृषि भूमि के लगभग 12% भाग पर जौ की कृषि की जाती है। जौ देश के दक्षिण भाग होंशू द्वीप में पैदा होता है। जहां तटीय भाग इसके मुख्य उत्पादक है। 

4. चाय:-  जापान में लगभग 3% चाय पैदा होती है। यहां चाय के लिए भौगोलिक परिस्थितियां अनुकूल है।जिस कारण से यहां पर चाय की प्रति हेक्टेयर उपज भारत तथा चीन से अधिक होती हैं। जापान में भारत की भाँति बड़े-बड़े बागान नहीं है बल्कि यहां पर चाय छोटे-छोटे फार्म पर उगाई जाती हैं। जिनका औसत क्षेत्रफल 1 हेक्टेयर होता है। टोकियो के दक्षिण की ओर मध्यवर्ती पर्वतश्रेणी की पूर्व ढालों पर चाय की झाड़ियां लगाई जाती हैं। यहां चाय के उत्पादन के क्षेत्र विख्यात है यहां वर्ष में चार बार चाय की पत्तियां तोड़ी जाती है।

5. अन्य फसलें:-  अन्य फसलों के अंतर्गत जई तथा  मक्का प्रमुख रूप में उत्पन्न की जाती है। मक्का की खेती होंशु द्विप के पहाड़ी भाग मेंं की जाती है।शकरकंद, सोयाबीन, सरसों, दाले, गन्ना, चुकंदर, कपास, आदि फसलों का भी जापान में उत्पादन होता है। जापान मेंं फलों की कृषि केे अंतर्गत सेेब संतरा तथा नारंगी प्रमुख हैं

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  1. दरअसल, अगर आप चावल के पौधे को सूखे खेत में उगाते हैं तो ये ज्यादा ऊंचे नहीं हो पाते। कम ऊंचाई का फायदा मिलता है। इससे सूरज की रोशनी पौधे के हर हिस्से पर पड़ती है। पौधे के पत्ते से लेकर जड़ तक सूरज की रोशनी जाती है। 1 वर्ग इंच की पत्ती से 6 दाने पैदा होने की संभावता ज्यादा बन जाती है। जबकि पौधे के सबसे ऊपरी हिस्से पर आने 3-4 वाली पत्तियों से ही करीब 100 दाने आ जाते हैं। मासानोबू बीज को थोड़ी ज्यादा गहराई में बोते थे, जिससे 1 वर्ग गज में करीब 20 से 25 पौधे उगते हैं। इनसे करीब 250 से लेकर 300 तक दानों का उत्पादन हो जाता है। खेत में पानी नहीं भरने से पौधे की जड़ ज्यादा मजबूत होती है। इससे बिमारियों और कीड़ों से लड़ने में पौधे को काफी मदद मिलती है। जून महीने में मासानोबू करीब 1 हफ्ते के लिए खेत में पानी को जाने से रोक देते हैं। इसका फायदा ये मिलता है कि खेत के खतरपतवार पानी की कमी की वजह से जल्दी मर जाते हैं। इसका फायदा ये होता है कि इससे चावल के अंकुर ज्यादा अच्छे से स्थापित हो पाते हैं। मासानोबू, मौसम के शुरु में सिंचाई नहीं करते। अगस्त के महीने में थोड़ा थोड़ा पानी जरूर देते हैं लेकिन उस पानी को वो खेत में रूकने नहीं देते।

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