जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड से संबंधित संपूर्ण जानकारी

रौलेट एक्ट

  • भारत में राज कर रही ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को ख़त्म करने के उद्देश्य से वर्ष 1919 में कई कानून लागू किये गए थे इन्हीं कानूनों में से एक था, फरवरी 1919 में पारित रौलेट एक्ट
  • यह कानून तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के लिए बनाया गया था। 
  • इसी संदर्भ में ब्रिटिश सरकार ने ‘सर रौलेट’ की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्ति की, जिसे इस बात की जाँच करनी थी कि भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों के माध्यम से सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र करने वाले लोग कहाँ तक फैले हुए हैं और उनसे निपटने हेतु किस प्रकार के कानून की आवश्यकता है।
  • इस संबंध में सर सिडनी रौलेट समिति ने जो सिफारिश दी उसे ही ‘रौलेट एक्ट’ कहा गया।
  • इस एक्ट के अन्तर्गत एक विशेष न्यायालय की स्थापना की गयी, जिसमें उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीश थे।
  • रौलेट एक्ट के नियमानुसार, ब्रिटिश सरकार को ये अधिकार प्राप्त हो गया था, कि वह किसी भी भारतीय पर अदालत में बिना मुकदमा चलाए, उसे जेल में बंद कर सकती थी।
  • भारतीयों ने इसका विरोध किया और इसे काला कानून कहा।
  • भारतीय ब्रिटिश सरकार किसी को भी संदेह के आधार पर गिरफ्रतार कर दो साल के लिए कैद कर सकती थी।
  • गांधीजी ने फरवरी 1919 में प्रस्तावित रौलेट एक्ट के विरोध में देशव्यापी आंदालेन का आह्नान किया, किन्तु सरकार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, इसके पश्चात् गांधीजी ने सत्याग्रह प्रारम्भ करने का निर्णय लिया।
  • इस सत्याग्रह के अन्तर्गत देशव्यापी हड़ताल, प्रार्थना सभाओं का आयोजन तथा कुछ प्रमुख कानूनों की अवज्ञा के साथ-साथ गिरफ्रतारी देने की योजना बनाई गयी।
  • सरकार की दमनकारी नीतियों और बलपूर्वक नियुक्तियों के कारण पंजाब की त्रस्त जनता ने हिंसात्मक प्रतिरोध प्रारम्भ कर दिया।

जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड (13 अप्रैल 1919)

  • 6 अप्रैल 1919 कोअमृतसर शहर में एक हड़ताल की गई जिसमें रौलेट एक्ट का विरोध किया गया।
  • इस अहिंसक आंदोलन ने हिंसक आंदोलन का रूप ले लिया। इस आंदोलन का प्रभाव हालाँकि पूरे देश में था लेकिन अमृतसर, लाहौर और गुजरावाला सबसे अधिक प्रभावित थे।
  • रौलेट एक्ट के विरोध में ब्रिटिश सरकार ने अमृतसर के दो लोकप्रिय नेता डॉ- सैफुद्दीन किचलु और डॉ- सत्यपाल को गिरफ्रतार कर लिया।
  • इन नेताओं की गिरफ्रतारी के विरोध में 10 अप्रैल 1919 को अमृतसर के लोगों ने बड़े पैमाने पर धरना प्रदर्शन किया।इस दौरान हिंसा की घटनाएँ भी हुईं।
  • उपद्रव को शांत करने के लिए राज्य में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया
  • तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी ब्रिगेडियर जनरल डायर को स्थिति शांतिपूर्ण बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गयी।
  • जनरल डायर ने 13 अप्रैल 1919 को एक घोषणा जारी की कि लोग ‘पास’ के बिना शहर से बाहर न जाएँ और एक समूह में तीन लोगों से अधिक लोग जुलूस/सभाएं न करें।
  • जनरल डायर की घोषणा से अनजान 13 अप्रैल (बैसाखी का दिन) को लोग बैसाखी मनाने के लिए जलियाँवाला बाग में इक्ट्ठा हुए थे।
  • स्थानीय नेताओं ने यहीं पर एक शांतिपूर्ण सभा का आयोजन किया, जिसमें दो प्रस्ताव- रौलेट अधिनियम की समाप्ति तथा 10 अप्रैल को हुई गोलीबारी की निंदा की गयी।
  • जनरल डायर ने इस सभा को सरकारी आदेश की अवहेलना समझा तथा सभा स्थल को सशस्त्र सैनिकों के साथ चारों तरफ से घेर लिया गया।
  • जनरल डायर ने बिना किसी पूर्व चेतावनी के लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया, जिसमें हजारों निर्दोष लोग मारे गये।
  • सरकारी आँकड़ों के मुताबिक जलियाँवाला बाग में हुए घटना में 379 लोग मारे गए जबकि 1500 लोग घायल हुए थे।
  • इसके विपरीत भारतीयों का मानना था कि इस घटना में 1000 से अधिक लोगों की मौत हुई।
  • इस घटना की पूरे देश तथा विश्व में बड़े स्तर पर निन्दा हुई। इसके विरोध में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘नाइटहुड’ की उपाधि त्याग दी।
  • जलियाँवाला हत्याकाण्ड की जांच हेतु ब्रिटिश सरकार द्वारा हंटर आयोग का गठन किया गया।

हंटर आयोग (14 अक्टूबर 1919)

  • जलियाँवाला हत्याकाण्ड की जाँच के लिए भारत सचिव एडविन मांटेग्यू ने एक समिति का गठन किया, जिसे हंटर कमीशन के नाम से जाना गया।
  • हंटर आयोग का उद्देश्य बंबई, दिल्ली एवं पंजाब में हुए उपद्रवों की जांच करना था और उपाय सुझाना था।
  • वर्ष1920 हंटर कमीशन की रिपोर्ट में ब्रिगेडियर जनरल डायर को दोषी पाया गया और कहा गया कि डायर ने अपने प्राधिकार से बाहर जाकर कार्य किया है।
  • लेकिन हंटर आयोग ने डायर के लिए किसी प्रकार के दंड या अनुशासनात्मक कार्यवाही की अनुशंसा नहीं की।
  • हंटर आयोग की जाँच शुरू करने से पहले , सरकार ने अपने अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए क्षतिपूर्ति अधिनियम पारित कर दिया।
  • इस क्षतिपूर्ति अधिनियम (इंडेमनिटी एक्ट) को वाइट वांशिग बिल कहा गया। मोतीलाल नेहरू तथा अन्य लोगों ने इस अधिनियम की निन्दा की।
  • इस तरह बिल पारित होने के पश्चात् देश के क्रांतिकारी युवाओं में और अधिक उग्रता का महौल पैदा हो गया, जिसमें भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव जैसे युवा शामिल थे।
  • इंग्लैण्ड में तत्कालीन युद्ध सचिव विंस्टन चर्चिल को इस रिपोर्ट की समीक्षा करने का कार्य सौंप दिया गया।
  • भारत विरोधी चर्चिल ने भी अमृतसर में घटी इस घटना की निन्दा की और इसे ‘शैतानी कृत्य’ करार दिया।
  • जनरल डायर को अपदस्थ करने के कैबिनेट के निर्णय को सेना परिषद् को भेज दिया गया और अंततः डायर को 1920 में उनके पद से हटा दिया गया।
  • 1927 में प्राकृतिक कारणों से ब्रिगेडियर जनरल डायर की मृत्यु हुई।
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