जीवविज्ञान शब्दावली भाग-1

जीवविज्ञान शब्दावली

  1. लिथोट्रिप्सी (Lithotripsy)- यह चिकित्सा की एक विधि है जिसमें आघात तरंगों के द्वारा गुर्दे और मूत्रवाहिनियों की पथरी को बिना शल्य क्रिया के निकाला जाता है। इन आघात ध्वनि तरंगों को निकालने वाले यंत्र का नाम लिथोट्रिप्टर है।
  2. अल्ट्रा साउंड तकनीक (Ultra Sound Technique)- यह शरीर के आन्तरिक रोगों का पता लगाने की विधि है। इसमें सूक्ष्म ध्वनि तरंगों (1 से 5 मेगाहर्ट्ज आवृत्ति) प्रयुक्त की जाती है। विद्युत ऊर्जा को ध्वनि ऊर्जा में बदलने का कार्य पीजो-इलेक्ट्रिक क्रिस्टल्स के द्वारा होता है। जो ‘ट्रान्सड्यूसर’ में लगा रहता है। ट्रान्सड्यूसर से निकली हुई सूक्ष्म ध्वनि तरंगं शरीर के वांछित अंग से टकराती हैं जिससे प्रतिध्वनि पैदा होती है। ट्रान्सड्यूसर पुनः प्रतिध्वनि को ग्रहण करके कम्प्यूटर को भेजता है। कम्प्यूटर में इन संकेतों का विश्लेषण होता है। स्क्रीन पर चित्र भी बनता है।
  3. डी.एन.ए. अंगुलिछाप (DNA Fingerprint)- इस विधि को लिस्टर विश्वविद्यालय के एलेक जैफ्रेस और उनके साथियों ने 1986 में विकसित किया है। इस विधि से अपराधी को पहचानने में आसानी हो गई है। किसी अपराधी की पहचान उसके रक्त, वीर्य, बाल आदि की सहायता से की जाती है। डी. एन.ए. को रक्त, वीर्य और बालों की जड़ों से अलग करके वेस्टर्न ब्लाटिंग करते हैं तथा बाद में डी.एन.ए. का संकरण कराते हैं। इस प्रकार डी.एन.ए. में बहुरूपता आ जाती है जो आनुवंशिक होती है। इस विधि से उत्तराधिकार के पेचीदे मामले सुलझाये जाते हैं।
  4. सेन्टोक्रोमान (Centochroman)- यह एक गर्भनिरोधक गोली है जो बाजार में ‘सहेली’ या ‘चॉइस-7’ के नाम से बिकती है। इसकी खोज केन्द्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने किया है। यह संस्थान वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (Council of Scientific and Industrial Research=CSIR) के अधीन है। सेन्टोक्रोमान को सप्ताह में केवल एक दिन खाना पड़ता है। सेन्टोक्रोमान गर्भाशय में,अण्डे बनने से रोकता है। भारतीय वातावरण में इस गोली को खाने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है।
  5. हेलियोथेरेपी (Heliotherapy)- यह एक चिकित्सा विधि है जिसमें सूर्य की किरणों से कई बीमारियों का इलाज किया जाता है।
  6. ब्रेकी थिरैपी(Brekkie therapy)- जान लेवा कैंसर के इलाज के लिए इरीडियम आधारित ‘ब्रेकी थिरैपी’ अब भारत में भी उपलब्ध हो गयी है। इस तकनीक की मदद से कैंसर ग्रस्त अंगों को काटे अथवा हटाये बिना कैंसर का उपचार मात्र चार मिनट में किया जा सकता । इसका उपयोग रक्त, अस्थि तथा जिगर के कैंसर को छोड़कर अन्य सभी तरह के कैंसर के उपचार के लिए किया जाता है।
  7. कॉकलीयर इम्प्लांट(Cochlear implant)- इस उपकरण का उपयोग जन्म से बहरे व्यक्तियों के सुनने के लिए किया जाता है।
  8. प्लास्टिक की खेती(Plastic Agriculture)- सं.रा. अमेरिका के जेम्स मेडीसन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने जीन अभियांत्रिकी से ऐसे जीवाणुओं का निर्माण किया जो प्लास्टिक के समान एक पालीमर बनाने में समर्थ थे। इसके बाद इम्पीरिकल केमीकल इन्डस्ट्रीज ने ऐसे जीवाणु बनाने का संयंत्र लगाया जो पाली हाइड्राक्सी ब्यूटारेट (Poly hydroxy butarate) बना सकते थे। कई वैज्ञानिक जीवाणुओं की जीन संरचना में परिवर्तन का प्रयास कर रहे हैं जिससे इनके द्वारा नये-नये पालीमरों का उत्पादन किया जा सके। रोहडोस्पीलम रुब्रम नामक बैक्टीरिया को सूर्य के प्रकाश की सहायता से नये प्रकार का पालीएस्टर बनाते पाया गया है जैव प्रक्रिया से प्राप्त प्लास्टिकों को बायोपालीमर कहते हैं।
  9. जैव संवेदक (Biosensor)- जैव संवेदक की खोज 1962 में लेलैन्ड क्लार्क ने किया। इस मशीन के द्वारा रोगी के शरीर में ग्लूकोज का स्तर मापने का कार्य किया जाता है। एक छोटे इलेक्ट्रोड पर ग्लूकोज आक्सीडेज नामक एन्जाइम की परत चढ़ाकर प्रथम जैव संवेदक का निर्माण हुआ। इस समय 100 से ज्यादा एन्जाइम प्रयोग में लाये जा रहे हैं। जैव संवेदक के दो भाग होते हैं- पहला तकनीकी भाग एक यंत्र होता है, मापकर इच्छित सूचना देता है। दूसरा भाग जैविक प्रोटीन होता । आजकल के आधुनिक जैव संवेदक पर्यावरण प्रदूषण की माप के लिए भी प्रयोग में लाये जा रहे हैं।
  10. क्लोनिंग (Cloning)– क्लोनिंग के अन्तर्गत किसी जीव के आनुवंशिक गुणों में वांछित परिवर्तन किया जाता है। पुर्नसंयोजी डी.एन.ए. (Recombinant DNA) तकनीक से ही क्लोनिंग की जाती है। किसी सूक्ष्मजीव (जैसे- कास्मिड, प्लामिड, एग्रोबैक्टिरियम आदि) के डी.एन.ए. में किसी वांछित जीव का जीन प्रत्यारोपित करके उस सूक्ष्मजीव के बहुत ढेर से प्रतिरूप तैयार कर लेते हैं। फिर इन सूक्ष्मजीवों के डी.एन.ए. को किसी दूसरे जीव (जसके गुणों में परिवर्तन करना होता है) के शरी में प्रत्यारोपित किया जाता है। विश्व की प्रथ स्तनी क्लोन डाली पात्रे निषेचन विधि से उत्पन्न की गई थी।
  11. बायोगैस(Biogas)- ग्रामीण क्षेत्रों में जहां पशुओं की संख्या अधिक है और खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए उत्तम खाद की आवश्यकता होती है वहां बायोगैस प्लान्ट लगाया जाता है। गोबर, मनुष्यों के मलमूत्र, कृषि अवशेष आदि पदार्थ बायोगैस प्लान्ट में डालते हैं जो सड़कर गैस बनती है। बायोगैस में मुख्यतः मिथेन गैस होती है। बायोगैस रसोईघर में इंधन का काम करती है। बायोगैस में मेंटल लगी हुई गैस (पैट्रोमेक्स) जलाया जाता है। यह ऊर्जा का गैर-पारम्परिक स्रोत है।
  12. राइबोजाइम तकनीक (Ribozyme technology)- अभी तक यह माना जाता था कि शरीर में उत्प्रेरक का काम सिर्फ प्रोटीन पदार्थ (एन्जाइम) ही करते हैं लेकिन 1989 के रसायनशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता अल्टमान और केच ने आर.एन.ए. (RNA) को भी एन्जाइम गुणों से युक्त बताया तो पूरी दुनिया आश्चर्यचकित रह गई। इसी कार्य के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया गया। राइबोजाइम चिकित्सा और कृषि जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बहुत उपयोगी है। भविष्य में एड्स, मलेरिया आदि असाध्य रोगों पर राइबोजाइम की सहायता से नियंत्रण किया जा सकेगा।
  13. केट तकनीक (CAT-Technology)– (CAT-Computerized Axial Tomography) केट तकनीक की सहायता से मस्तिष्क के सूक्ष्म भागों का अध्ययन किया जाता है। इसमें रोगी के मस्तिष्क के चारों ओर एक्स-किरण नलिका को घुमाकर एक्स-किरणों का प्रवाह किया जाता है। यह एक्स-किरणे हड्डियों तथा मांस-पेशियों से होकर मस्तिष्क में से निकलती है। इन किरणों की पहचान के लिए मस्तिष्क की दूसरी तरफ एक्स-किरण संवेदनशील प्लेट लगी होती है। इस प्लेट से मिले संकेतों को कम्प्यूटर द्वारा संसाधित किया जाता जिससे मस्तिष्क के अलग-अलग भागों का द्वि-विमीय चित्रण किया जाता है।
  14. सेटेलाइट विषाणु(satellite virus)- विषाणु (वाइरस) एक अतिसूक्ष्मदर्शी जीव है जिसे केवल इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी से देखा जा सकता है। सर्वप्रथम केसेनिस ने 1962 में ‘सेटेलाइट विषाणु’ का नाम दिया। इसका व्यास लगभग 17 माइक्रो-मीटर होता है। इसके कुल भार का 20% आर.एन.ए. पाया जाता है। सेटेलाइट विषाणु के शुद्ध कण को 17 वर्ष तक 3°C ताप पर सुरक्षित रखने पर भी इसकी संक्रामकता नष्ट नहीं होती है
  15. फीरोमोन(Pheromone)-एक विशेष प्रकार के रसायन गंधयुक्त पदार्थ जो शरीर से स्रावित होते हैं। ये पदार्थ उसी जाति के प्राणियों द्वारा ग्रहण किये जाते हैं और उनके व्यवहार में अनेक परिवर्तन उत्पन्न करते हैं। 1959 में कार्लसन ने इस पदार्थ का नाम ‘फीरोमेन’ रखा। उदाहरण- चीटियों का पंक्तिबद्ध होकर चलना फीरोमेन का ही प्रभाव है। कुछ स्तनधारी जानवरों में मलद्वार में स्थित विशेष ग्रंथियों को जमीन पर रगड़ने से फीरोमोन निकलता है। इस प्रकार वह विपरीत लिंगी साथी या उसी जाति के अन्य सदस्यों को आकर्षित करते हैं।
  16. लैमार्कवाद(Lamarckism)- जीवों के स्वभाव, रहन-सहन तथा विकास पर वातावरण का प्रभाव पड़ता है जिससे जीव वातावरण के परिवर्तनों के अनुरूप स्वयं को ढाल लेते हैं और उनके अंगों में परिवर्तन आने के कारण कुछ अंग विलुप्त होते हैं जबकि कुछ अंग नये बनते हैं। इस प्रकार नये लक्षण वंशागति होने लगते हैं इसी सिद्धान्त को लैमार्कवाद कहते हैं।
  17. प्राकृतिक चयन (Natural selection)- प्राकृतिक संघर्ष में वातावरण के अनुकूल जीवों के उचित प्रकार जीवित रहने, साथ ही वातावरण के प्रतिकूल प्राणियों के नष्ट हो जाने को प्राकृतिक चयन कहते हैं।
  18. जीन राशि (Gene pool)- किसी भी विशेष क्षेत्र में किसी एक, जाति के सभी सदस्यों में पाई जाने वाली सभी जीनों को मिलाकर जो राशि बनती है उसे जीनराशि कहते हैं।
  19. आनुवंशिक अपवहन (Genetic drift)- किसी विशेष जाति की जनसंख्या किसी प्राकृतिक प्रकोप से कम हो जाती है तो उस जाति की जीन राशि घट जाती है। इससे उस जाति के जीवों में बहुत से जीन नष्ट हो जाते हैं। इससे जीन बदल जाता है और नई जाति का विकास होता है। कभी-कभी प्राकृतिक चयन, रिकम्बिनेशन, उत्परिवर्तन तथा संकरण से भी जीन राशि बदल जाती है। इसे आनुवंशिक अपवहन कहते हैं।
  20. एक्यूपंक्चर (Acupuncture)- यह विभिन्न रोगों के इलाज की चीनी पद्धति है। इस विधि के अनुसार शरीर में 500 स्थान ऐसे माने गये हैं, जहां सुई चुभोने पर वह स्थान सुन्न हो जाता है। इस विधि से सुई चुभोने पर दर्द कम हो जाता है और खराब रक्त निकाल कर रोग को दूर करते हैं।
  21. एनेस्थेटिक (Anesthetic)- ये ऐसे रासायनिक यौगिक हैं जो शरीर में बेहोशी की स्थिति लाते हैं। जैसे- क्लोरोफार्म आदि ।
  22. एस्पिरीन (Aspirin)- दर्द दूर करने के लिए अचूक दवा है। इसका रासायनिक नाम एसिटिल सेलीसिलिक एसिड (Acetyl Salisylic acid) है।
  23. हाइबरनेशन (Hibernation)- अत्यधिक शीत तथा ताप में बहुत से गर्म रक्त वाले जीव जैसे- मेढ़क, छिपकली, सांप आदि जमीन के नीचे चले जाते हैं। इस प्रकार वे जीव असामान्य ताप में अपनी उपापचय क्रियाएं, धीमी कर लेते हैं। यह प्रक्रिया हाइबरनेशन कहलाती है।
  24. पेस मेकर (Pace maker)- यह हृदय का एक अंग है। किन्तु हृदय जब असामान्य हो जाता है तो कृत्रिम पेस मेकर लगाया जाता है। यह बैटरी युक्त छोटा सा उपकरण हृदय को गतिशील बनाये रखता है। एक कृत्रिम पेसमेकर लगभग 10 वर्ष तक कार्य करता है।
  25. पाश्चरीकरण (Pasteurization)- यह द्रव खाद्य सामग्री को खराब होने से बचाने की एक विधि है। इस विधि की खोज लुई पाश्चर ने किया था इसलिए उन्हीं के नाम पर इसका नाम पाश्चयीकरण पड़ गया। दूध को 62°C ताप पर 30 मिनट तक गर्म करते हैं तो वह दूध का पाश्चरीकरण कहलाता है। इतने ताप पर गर्म करने से जीवाणु मर जाते हैं और उनमें आवश्यक प्रोटीन, इन्जाइम इत्यादि नष्ट नहीं होते हैं।
  26. इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राफ या ई.ई.जी. (Electroncephalograph or E.E.G.)- यह एक यंत्र है जिसके द्वारा मस्तिष्क की गतिविधियों को अंकित करके उनका अध्ययन करते हैं।
  27. लाई डिटेक्टर (Lie-detector)- यह एक मशीन है जो मनुष्य के झूठ बोलने पर बता देती है कि वह झूठ बोल रहा है। अपराधी अपना अपराध छिपाने के लिए जब झूठा उत्तर देता है तो अपराधी का रक्त दाब, मांस पेशियों में तनाव, सांस लेने की प्रक्रिया में बदलाव कम्पन्न द्वारा मशीन पर अंकित होते रहते हैं। सामान्य अवस्था के व्यवहार से अन्तर होने पर वह व्यक्ति अपराधी सिद्ध हो जाता है।
  28. प्लास्टिक सर्जरी (Plastic Surgery)- भारी घाव लगने से या जलने-कटने से चेहरे पर विकृतियां आ जाती हैं। इस विकृति को दूसरे स्थान का ऊतक या कृत्रिम अंग लगाकर दूर किया जाता है। इस विधि को प्लास्टिक सर्जरी कहते है।
  29. स्टेथोस्कोप (Stethoscope)- इस यंत्र की मदद से किसी व्यक्ति के हृदय की धड़कन की गति मालूम की जाती है।
  30. मेन्डेल के नियम (Mandel’s Law)– मेन्डेल के तीन नियम इस प्रकार हैं-

(A) प्रभाविकता का नियम (Law of Doininance)- दो विपरीत गुणों वाले जीन के प्रथम पीढ़ी के संकरण के बाद एक गुण प्रभावी होता है तथा दूसरी अप्रभावी होता है। प्रभावी कारक अप्रभावी कारक को दबा देता है।

 (B) पृथक्करण का सिद्धान्त (Law of segragation)-इसे ‘गैमिट के शुद्धता’ का नियम भी कहते हैं। जब प्रथम पीढ़ी (F) की संतानों का संकरण कराया जाता है तो प्रभावी और अप्रभावी गुण अलग हो जाते हैं।

(C) स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)- जब कई गुणों वाले जीन्स संकरण के समय कभी एक साथ हो जाते हैं किन्तु पीढ़ी-दर-पीढ़ी संकरण करने से वे गुण अलग-अलग स्वतंत्रतापूर्वक रहते हैं।