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कृत्रिम कायिक प्रवर्धन क्या होता है ?| ARTIFICIAL VEGETATIVE PROPAGATION

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पौधों में स्वयं मानव द्वारा कृत्रिम विधि से किए गए कायिक प्रवर्धन को कृत्रिम कायिक प्रवर्धन कहते हैं। 
इससे मातृ पौधों के शरीर से विशेष विधियों द्वारा एक अंश अलग कर दिया जाता है। और फिर से स्वतंत्र रूप से भूमि में उगाया जाता है। जिन पौधों में बीज बनने बीजों के अंकुरण में कठिनाई होती हैं। उनमे कृत्रिम कायिक प्रवर्धन अधिक उपयोगी सिद्ध होता है। 

यह निम्नलिखित विधियों द्वारा संपन्न किया जाता है- 

1. कलम लगाना:- इस विधि में पुराने स्वस्थ तनों या शाखाओं के 20 से 30 सेमी लंबे टुकड़े काट लिए जाते हैं। और भूमि में आधे गाड़ दिए जाते हैं। कुछ समय बाद भूमिगत भाग की पर्वसन्धियों से जड़े निकलती हैं तथा इसी स्थान से कक्षस्थ कलिकाएँ विकसित होती हैं। जो वृद्धि करके पौधों को जन्म देती हैं। कलमों को जल की अधिक आवश्यकता होती है।इसी कारण कलमों को बरसात के दिनों में लगाई जाती हैं।
जैसे:- गुलाब गुड़हल गन्ना नींबू अनार अंगूर कनेर आदि पौधे ऐसी विधि द्वारा उगाए जाते हैं।

जिन पौधों की कलम की जड़े कठिनाई से निकलती हैं तो उनमे इंडोल एसिटिक अम्ल तथा इंडोल ब्यूटाईरिक अम्ल के घोल में डुबोकर भूमि में लगाया जाए तो जड़े शीघ्र ही फूटने लगती हैं। 

2. रोपड़ लगाना:- किसी जड़ सहित पौधे के कटे हुए तने पर किसी दूसरे पौधे के तने उगाने की विधि को रोपण कहते हैं। इस विधि द्वारा किसी बेकार नस्ल के पौधे की टहनी काटकर उस पर अच्छी नस्ल के पौधे की एक टहनी लगा दी जाती है। और दोनों के कटे हुए भाग को जोड़कर धागे से बांध देते है। उसके बाद जोड़ के चारों ओर नम मिट्टी का लेप कर देते हैं। लगभग 1 माह पश्चात् दोनों के ऊतक जुड़ जाते हैं इस प्रकार नए पौधे का निचला भाग घटिया नस्ल का तथा ऊपरी भाग बढ़िया नस्ल का हो जाता है। क्योंकि पुष्प फल ऊपरी भाग पर ही लगते हैं। इस विधि का प्रयोग एक ही जाति के 2 पौधों में संभव है।

जैसे:- आम पर अमरूद अथवा अमरुद पर बेर का रोपण नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत सेब पर सेव अथवा नाशपाती का रोपण किया जा सकता है 

3. दाब लगाना:- इस विधि में पौधे की भूमि के निकट वाली शाखा जो भूमि पर लटकती है। वहां पर इसकी छाल को चाकू से हटा देते हैं। और इस शाखा को नीचे झुका कर भूमि के अंदर लकड़ी की पिन द्वारा इस प्रकार दबाते हैं की कटा हुआ भाग भूमि के अंदर रहे भूमि के इस भाग को बराबर सींचते रहना चाहिए। कुछ दिनों पश्चात कटे भाग से जड़े निकल आती हैं।तब इस शाखा को इसके मातृ पौधे से काट कर अलग कर लेना चाहिए। 

जिन पौधों की निचली शाखाएं भूमि तक नहीं पहुंच पाती हैं। उनके नीचे गमला रख देते हैं। 
जैसे:- सेब नाशपाती चमेली अंगूर आदि।

4. गूटी लगाना:- इस विधि का प्रयोग वृक्षों की अधिक ऊंचाई पर स्थित शाखाओं पर किया जाता है। जहां पर दाब विधि का प्रयोग नहीं हो पाता। इसमें वृक्ष की एक स्वस्थ शाखा के बीच से चाकू द्वारा छाल हटा देते हैं। और कटे हुए भाग पर गीली मिट्टी लपेटकर मोटे कपड़े या टाट से बाँध देते हैं। मिट्टी को नाम रखने के लिए शाखा से ऊपर की शाखा में जल से भरा एक घड़ा लटका देते है। तथा घड़े की पेंदी में छेद कर देते है। और इसे रस्सी से बांध कर रस्सी का सिरा टाट पर लपेट देते है।  जिससे कि पानी रस्सी से होता हुआ टाट तक पहुँच कर मिट्टी को गीला रख सके। और कुछ दिनों बाद कटे हुए भाग से जड़ निकल आती है। तथा अब इसे भूमि पर कही भी लगा सकते हैं।

जैसे:- लीची लौकाट आदि।

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3 thoughts on “कृत्रिम कायिक प्रवर्धन क्या होता है ?| ARTIFICIAL VEGETATIVE PROPAGATION”

  1. कृत्रिम कायिक प्रवर्धन के लाभ :-
    1. इस विधी द्वारा उत्त्पन नये पौधे अपने जनक पौधो के समान होते है| जनक पौधो की वांछनीय विशेषताओं को दोबारा दोहराया जा सकता है|
    2. बीजो से विकसित किये गये फल वाले पेड़ो को फलने में कई वर्ष लग जाते है| परन्तु कर्तनों को कलमो से विकसित करने में कम समय लगता है|
    3. इस प्रकार के पौधो को कम देखभाल की जरूरत होती है| एक जनक पौधे द्वारा ही कई नये पौधो को उगाया जा सकता है|
    उतक संवर्धन :- उपयुक्त उत्पादन माध्यम में पौधे के वर्धमान अग्र भागों से विलगित पादप ऊतक के छोटे टुकड़े से नये पौधों का उत्पादन, उतक संवर्धन कहलाता है| इस विधी के लिए पादप ऊतक के छोटे टुकड़े को पौधे के संवर्धन भाग से लेते है| और उसे निर्जीवाणु जेली में रखते है| जिसमे पोषक और पादप हार्मोन होते है| इसमें पादप ऊतक की कोशिकाओं को विभाजित कर के कई कोशिकाएँ उत्तपन्न करवाते है| इनसे बने बैडोल पिंड को कैलस कहते है|इस कैलस को बाद में दूसरी जेली में स्थान्तरित करा दिया जाता है| जो इसकी जड़ें विकसित करता है| जड़ो युक्त कैलस को अन्य जेली में स्थान्तरित किया जाता है| जिसमे प्ररोह विकसित होता है, इस प्रकार उतपन्न नन्हे पौधो को भूमि में लगाकर विकसित होकर वयस्क पौधे बना सकते है| इस विधि को सूक्ष्मप्रवर्धन भी कहते है|
    ऊतक संवर्धन के लाभ :- यह एक शीघ्रगामी विधि है| पादप ऊतक की अलप मात्रा से कुछ सप्ताह में ही हजारो पादप उत्तपन्न किये जा सकते है| उतपन्न नये पौधे रोग मुक्त होते है| मौसम का ख्याल रखे बिना भी इस विधी से वर्ष भर नये पौधों को उपजाया जा सकता है| इस विधी के लिए बहुत कम जगह की आवश्यकता होती है|
    लैंगिक प्रजनन :- इस विधी में जनन के लिए लैंगिक अंगो की आवश्यकता होती है| तथा दो जनक इसमे सम्मिलित होते है, जिनमे एक नर तथा दूसरा मादा होती है| पौधों में लैंगिक जनन उनके पुष्पो के अंदर होता है|
    पौधों में लैंगिक प्रजनन के चरण :- पुष्प का पुंकेशर नामक अंग पौधे के नर युग्मको को बनाता है| पुष्प का अंडप नामक अंग पौधों के मादा युग्मको को बनाता है| ये मादा युग्मक बीजांडो में उपस्थित होते है| परागकणों में उपस्थित नर युग्मक, बीजांडो में उपस्थित मादा युग्मको या अंड कोशिकाओ का निषेचन करते है| निषेचित अण्ड कोशिकाएं बीजांडो के भीतर विकसित होती है| बीज हो जाती है| बीज उत्तपन्न होने नये पौधे उत्तपन्न होते है|
    पुष्प के मुख्य भाग :-
    1. पुष्पधर :- पुष्प का आधार जिससे पुष्प के सभी भाग लगे रहते है, पुष्पधर कहलाता है|
    2. बाह्यदल:- फूल के बाहरी चक्र में हरे , पत्ती – नुमा भाग बाह्य दल कहलाते है| सभी बाह्य दल एक साथ दल पुंज कहलाते है|
    3. पंखुड़िया :- पुष्प के रंगीन भाग दल या पंखुड़िया कहलाते है|
    4. पुंकेसर :- यह पौधे का नर जनन अंग होता है| इसका फुला हुआ भाग पराग कोष कहलाता है| इसी से पराग कण उत्तपन्न होते है|
    5. अंडप :- यह पुष्प का मादा अंग होता है| यह तीन भागो से बना होता है| वर्तिकाग्र, विर्तिका और अंडाशय |
    परागण :- पुंकेशर के पराग कोष से पराग कणों का , अंडप के वर्तिकाग्र को स्थानांतरण, परागण कहलाता है| जब पुष्प के पराग कोष से परागकणों का उसी पुष्प के वर्तिकाग्र को हस्तांतरित होते है तो इसे स्व-परागण कहते है| जब एक पौधे पर पुष्प के पराग कोष
    से परागकण किसी दूसरे समान पौधे के पुष्प पर हस्तान्तरित होते है तो यह परपरागण कहलाता है|
    निषेचन :- जब परागकण में उपस्थित नर युग्मक बीजाण्ड में उपसिथत मादा युग्मक के साथ संयोजन करता है तो इसे निषेचन कहते है| यह निम्न प्रकार होता है, जब पराग कण अंडप के वर्तिकाग्र पर गिरता है, वह फटकर खुल जाता है| और वर्तिका से होकर नीचे की और अंडाशय की ओर पराग नली विकसित करता है| नर युग्मक पराग नली में नीचे की और जाता है| यह पराग नली बीजाण्ड में खुलती है| अंडाशय में, पराग का नर युग्मक बीजाण्ड में उपस्थित मादा युग्मक या अंडाणु के केन्द्रक के साथ सयुंक्त होकर निषेचित अंडाणु बनाता है| और निषेचन की प्रक्रिया का पूर्ण करता है|
    प्राणियों में लैंगिक प्रजनन :-
    नर और मादा :- वह जीव जिसके शरीर में शुक्राणु नामक नर जनन कोशिका पायी जाती है, नर कहलाता है| तथा वह जीव जिसके शरीर में अंडाणु नामक मादा लिंग कोशिका पायी जाती है, मादा कहलाता है|
    युग्मक :- लैंगिक जनन में शामिल होने वाली कोशिका ये युग्मक कहलाता है| नर युग्मक को शुक्राणु तथा मादा युग्मक को अंडाणु कहते है| कोई भी शुक्राणु किसी भी अंडाणु से कई गुना छोटा होता है| शुक्राणु की एक लंबी पूछ होती है जिस की सहायता से वह गतिशील रहते है|
    निषेचन :- लैंगिक प्रजनन के दौरान नर युग्मक का मादा युग्मक के साथ संलयन होकर युग्मनज बनना, निषेचन कहलाता है| युग्मनज निषेचित अण्ड होता है| युग्मनज से शिशु बनने की अवस्था को भ्रूण कहते है| निषेचन दो प्रकार का होता है| आंतरिक निषेचन और बाह्य निषेचन, जब निषेचन मादा के शरीर के अंदर होता है, तो उसे आंतरिक निषेचन कहते है| तथा जब निषेचन मादा के शरीर के बाहर होता है तो उसे बाह्य निषेचन कहते है| आंतरिक निषेचन स्तनधारियों की मादाओं में सम्पन्न होता है| उभयचरों में बाह्य निषेचन होता है|
    लैंगिक प्रजनन के लाभ :- इस विधि से होने वाले प्रजनन में जीव संख्या में अत्यधिक विवधता को बढ़ावा मिलता है| इस प्रकार आनुवांशिक विविधता के कारण नयी जातियों की उतपत्ति होती है| लैंगिक प्रजनन में डीएनए द्वि गुणित नही होता है क्योंकि जनन कोशिकाओ में समसूत्री विभाजन होता है| जिसके कारण नर व मादा के गुणसूत्रों की संख्या आधी आधी ही रह जाती है| तथा जब ये गुणसूत्र पुनर्सयोजित होते है तो पूर्व की संख्या प्राप्त कर लेते है|
    प्राणियों में लैंगिक प्रजनन सम्पन्न होने की प्रक्रिया :- नर जनक शुक्राणु नामक नर युग्म को उतपन्न करता है| शुक्राणु में गति करने के लिए एक लंबी पूछ युक्त सूक्ष्म कोशिका होती है| मादा जनक अंडाणु नामक मादा युग्मनज को उतपन्न करता है| अंडाणु काफी अधिक कोशिका द्रव्य युक्त, शुक्राणु से काफी बड़ी कोशिका होती है| शुक्राणु, अंडाणु में प्रवेश करता है| और उसके साथ संलयित होकर युग्मनज नामक नई कोशिका बनाता है| यह प्रक्रिया निषेचन कहलाती है| युग्मनज इस के बाद बारम्बार विभाजित हो कर बड़ी संख्या में कोशिकाये बनाती है| और आख़िर कार एक नये शिशु का निर्माण करती है|
    यौवनारम्भ :- वह आयु जिस मे लिंग हार्मोनों का उत्तपन्न होना प्रारम्भ हो जाता है तथा बालक और बालिकाओ में लैंगिक रूप से परिपक्वता आ जाती है इस स्थिति को यौवनारम्भ कहते है| इस समय बालको के चेरहे व शरीर के अन्य भागो पर बाल उगने लगते है| शरीर, पेशियों के विकास से अधिक हट्टा कट्टा हो जाता है| यह सब नर हार्मोन टेस्टोस्टीरॉन के कारण होता है| बालिकाओ में जनन क्षेत्रो में बाल उग जाते है, अंडवाहिनिया, योनि और गर्भाशय का विकास होता है| रजोधर्म प्रारम्भ हो जाता है| यह सब इस्ट्रोजन और प्रोजेस्टिरॉन हार्मोन के कारण होता है|
    मानव जनन तंत्र :- मनवो में दो प्रकार के जनन तंत्र होते है| नर जनन तंत्र और मादा जनन तंत्र
    नर जनन तंत्र :- मानव जनन तंत्र के मुख्य भाग निम्न है| वृषण, वृषणकोष, अधिवृषण, शुक्रवाहक, शुक्राशय, प्रोटेस्टग्रंथि, तथा शिश्न| वृषण अंडाकार आकृति के अंग होते है| जो पुरुष की उदर गुहा के बाहर स्थित होते है| इनकी संख्या दो होती है| यह प्राथमिक जनन अंग होते है| इनका कार्य शुक्राणुओं का निर्माण करना होता है| यह टेस्टोस्टीरॉन नामक हार्मोन का निर्माण करते है| उदर गुहा से बाहर स्थित होने का कारण यह है कि शुक्राणु शरीर के ताप पर निर्मित नही होते है| इनका ताप शरीर के ताप से 3 डीग्री सेल्सियस कम होता है| यहां से शुक्राणु बाहर आकर अधिवृक्क नामक कुंडलित नली में जाते है| अधिवृषण से, शुक्राणुओं को शुक्रवाहक नामक लंबी नलिका में पहुचाया जाता है जो मूत्राशय में मूत्रमार्ग नामक लंबी नली से मिलता है| शुक्रवाहक के रस्ते में, शुक्राशय नामक ग्रंथियाँ और प्रोटेस्ट ग्रंथी मिलती है| यह ग्रंथि अपने स्रावों को शुक्राणुओं में मिलाती है| जिससे शुक्राणु तरल हो जाते है| यह तरल वीर्य कहलाता है| जो शिश्न से बाहर निकाला जाता है|
    मादा जनन तंत्र :- मादा जनन तंत्र के मुख्य भाग अंडाशय, अंडवाहिनी, गर्भाशय, तथा योनि होता है| अंडाशय एक अंडाकार आकृति का अंग है| यह उदर गुहा के भीतर स्थित होता है| एक स्त्री के दो अंडाशय होते है| यह मादा के प्रमुख जनन अंग होते है| अंडाशयों का कार्य अण्ड का निर्माण करना होता है| इनसे इस्ट्रोजन और प्रोजेस्टिरॉन नामक हार्मोन भी उतपन्न होता है| यौवनारम्भ पर यह अंडाणु परिपक्व हो कर अंडो का निर्माण प्रारम्भ कर देते है| अंडाशयों के ठीक ऊपर कीप की आकृति से जुडी हुई अंडवाहिनी होती है| अण्ड कीप आकृतिक प्रवेश द्वार पर जाता है, जहाँ शुक्राणुओं द्वारा निषेचन की क्रिया सम्पन्न होती है| अंडवाहिनियो का दूसरा शिरा गर्भाशय नामक थैले से जुड़ा होता है| जिसकी दीवारों से चिपक कर भ्रूण का विकास शिशू के रूप में होता है| इस गर्भाधारण की अवधि 9 माह होती है| भूर्ण माता द्वारा एक विशिष्ट ऊतक अपरा द्वारा जुड़ा होता है| जिससे पोषण, श्वसन और उत्सर्जन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ती होती है|
    रजोधर्म :- जब किसी बालिका में लगभग 10 से 12 वर्ष की आयु में यौवनारम्भ होता है| तो उसके शरीर में मोचित लिंग हार्मोन उस के अंडाशय में अंडाणुओं में से कुछ को परिपक्व कर देते है| प्रायः एक परिपक्व अंडाणु प्रतेयक 28 दिनों में एक बार अंडाशय से अंडवाहिनी में मोचित होता है| यह अंडोउत्सर्ग कहलाता है| इस समय गर्भाशय काआंतरिक स्तर स्पंजी होकर नन्ही रुधिर कोशिकाओं से भर जाता है| और स्वयं को निषेचित अंडे की प्राप्ति के लिए तैयार कर लेता है| यदि अंडा निषेचित होकर वहाँ नही पहुचता है तो वह स्तर टूटकर ऋतु स्त्राव के रूप में योनि से बाहर बहने लगता है| इसमें 4 से 5 दिनों का समय लगता है| इस के पश्चात गर्भाशय पुनः अपने आपको आगे के लिए तैयार करता है|
    सन्त तनिरोधक विधियां :- यह मुख्य तौर पर तीन विधिया होती है| 1. रोधिकाविधि , 2. रासायनिकविधि, 3. शल्यकविधि |
    रोधिका विधि में आवरण का उपयोग कर के शुक्राणुओं को अंडाणुओं से मिलने से रोका जाता है| रासायनिक विधि में गर्भ निरोधक गोलियों का उपयोग करके सन्ततिनिरोध किया जाता है| शल्यक विधि में नर की शुक्रवाहिनी तथा मादा की अण्डवाहिनी को शल्य विधि द्वारा बन्दकर दिया जाता है इसे नसबंदी कहते है|
    यौन प्रदत रोग :- ऐसे रोग जो संक्रमित व्यक्ति द्वारा यौन सम्पर्क बनाने पर फैलते है यौन प्रदत्त रोग कहलाते है| जैसे सुजाक, आतशक तथा एड्स

  2. पादप प्रवर्धन (Plant Propagation) पौधों में अन्य जीवों की भांति अपने जैसे पौधे पैदा करने की क्षमता होती है। यह कार्य पौधों में अनेक प्रकार से होता है। इसे मुख्यत: तीन मौलिक भागों में विभाजित किया जा सकता है। एक वह, जिसमें प्रवर्धन उन फलों तथा बीजों द्वारा होता है जो लैंगिक प्रजनन द्वारा बनते हैं, दूसरे वह, जिसमें लैंगिक प्रजनन की आवश्यकता नहीं पड़ती और प्रवर्धन पौधों के वर्धन भागों से, जैसे तना, पत्ती, जड़ द्वारा होता है। तीसरा वह, जिसमें प्रवर्धन कृत्रिम विधि से होता है।

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